गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

शहीदों के खून पर अंतुले की सियासत

क्या आतंक के हमदर्द है भारत के नेता ?
हमारे देश में कुछेक राजनेताओं के कारण अक्सर चर्चा का माहौल बना रहता है और अभी सियासत के गलियारों में मुंबई में हुए आतंकी हमलों के मामले फिर से गहमागहमी का माहौल है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने फिर एक बार पलटी मारी है और वही घिसा-पीटा रेकर्ड बजाकर कहा है कि मुंबई पर हमला करने वाले आतंकी पाकिस्तानी थे इसके कोई पुख्ता सुबूत नहीं है। जरदारी ने पूरी जिंदगी कुछ नहीं किया है और वे पाकिस्तानी है। ऐसे में हम उनसे कौन सी उम्मीद कर सकते है? जरदारी ने आतंकी सरदार मौलाना मसूद अजहर के मामले भी अपना पल्ला झाड लिया है। अभी कुछ दिनों पहले ही मसूद को नजरकैद रक्खा गया है ऐसी घोषणा करने वाले जरदारी ने अचानक ही पलटी मारकर घोषणा कर दी कि हमारे पास मसूद का कोई अता-पता नहीं है।
एक ओर पाकिस्तान झूठ पे झूठ बोल रहा है वहीं हमारे देश के राजनेता भी उल्टे-पुल्टे निर्णय लेकर अपना मन मनाने में जुटे है। इसी कवायत के चलते सरकार ने भारतीय क्रिकेट टीम का पाकिस्तान प्रवास भी रद्द कर दिया है। दूसरी ओर रक्षा मंत्री ए.के.एन्टोनी ने सेना के तीनों दलों के अध्यक्षों की बैठक बुलाई जिसे देख हमें कुछ आशा बंधी थी कि चलो अब तो पाकिस्तान को सबक सीखाने के लिए हमने ठानी है वही एन्टोनी ने घोषणा कर दी कि पाकिस्तान के सामने युद्ध का कोई इरादा नहीं है और हमारा सारा जुनून यही चकनाचूर हो गया।
यह इस देश की बदनसीबी है कि इन जख्मों के चलते अल्पसंख्यक मामलों के केन्द्रीय मंत्री ए.आर.अंतुले ने मुंबई हमले के समय शहीद हुए एटीएस चीफ हेमंत करकरे की शहादत पर विवादास्पद बयान दिया है। कुछ अंतुले के बारे में जानें। अब्दुल रहमान अंतुले महाराष्ट्र के रायगढ जिले के मुस्लिम परिवार से है। पेशा वकीलात का है और मुंबई युनिवर्सिटी एवं लंदन में लिंकन इन्स्टीटयूट में पढे है। लेकिन उन्होंने वकीलात कम और नेहरु-गांधी परिवार की भक्ति ज्यादा की है और उनकी भक्ति का उन्हें अच्छी मात्रा में फल भी मिला है। जिस तरह श्रीराम का नाम लेकर समुद्र में डाले हुए पत्थर तैर गए थे उसी तरह इस देश में नेहरु-गांधी खानदान के नाम से बहुत सारे पत्थरों का बेडा पार हुआ है जिसमें अंतुले भी शामिल है। अंतुले 1962 में विधान परिषद के सदस्य चुने गए और यही से उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। 1976 तक वे विधान परिषद में चुनकर आते रहे और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री पद पर रह चुके है। उस वक्त उनकी गिनती बडे नेताओं के तौर पर तो नहीं होती थी लेकिन 1977 में आपातकाल के बाद इन्दिरा गांधी हार गई थी तब शरद पवार सहित अन्य दिग्ग्ज इन्दिरा के डूबते जहाज को छोडकर भाग खडे हुए थे तब अंतुले ने इन्दिरा और संजय के साथ खडे रहकर उनकी तन, मन और धन से सेवा की थी। 1980 में इन्दिरा ने जबरदस्त पुन:आगमन किया तब उन्होंने अंतुले की तीन साल की सेवा बदले में उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री पद देकर उनकी सेवा की कद्र की थी। उस वक्त क्वॉटा सिस्टम था और सिमेन्ट का आवंटन क्वॉटा के जरिये होता था। बिल्डरों को ज्यादा सिमेन्ट लेने के लिए राजनेताओं के आगे-पीछे घुमना पडता था। अंतुले ने इस मौके का भरपूर लाभ उठाया और इन्दिरा गांधी प्रतिष्ठान ट्रस्ट सहित कुछेक ट्रस्ट भी खडे कर दिये थे। जो बिल्डर इस ट्रस्ट को दान देता उसे अंतुले केन्द्र में से ज्यादा सिमेन्ट दिलवा देते। बाद में इस कारस्तान का भांडा फूटा और मुंबई हाइकोर्ट ने फिरौती वसूलने के आरोप में अंतुले को दोषी ठहराया। इस फैसले के चलते अंतुले को इस्तीफा देना पडा। उसके बाद अंतुले महाराष्ट्र की राजनीति में से गायब हो गए और लोकसभा में चुनकर आते रहे। बाद में केन्द्रीय मंत्री बनते रहे है लेकिन अब पहले वाला प्रभाव नहीं रहा।
देश जब दहशतगर्दी के खिलाफ जंग के नाजुक मोड पर है तब राजनीति कलाबाजी से सुर्खियों में छाये अंतुले संप्रदायवाद को बढावा दे रहे है। मुंबई विस्फोट में पूर्व एटीएस चीफ हेमंत करकरे की शहादत पर अंतुले ने जिस प्रकार जहर उगला है उससे सांप्रदायिकता की बू आती है। वह कह रहे है कि पाकिस्तानी आतंकवादियों को भला क्या जरूरत थी कि वे चुनकर हेमंत करकरे, अशोक कामटे और विजय सालस्कर को ही मारते? वह यही चुप नहीं रहे। अब वह राष्ट्रीय जांच एजेन्सी (NIA) के गठन की भी आलोचना कर रहे हैं।
अंतुले के मुताबिक हेमंत करकरे के मौत के पीछे हिन्दुवादी का हाथ है। अंतुले ने कुबूल किया है कि करकरे और उनके साथियों की मौत आतंकियों द्वारा हुई लेकिन इसके साथ वे यह भी कह रहे है कि उन्हें कामा अस्पताल की ओर किसने भेजा। करकरे और उनके साथी पुलिस डिपार्टमेन्ट में थे और पुलिस का फर्ज है कि वे लोगों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करे। कसाब और उसका साथी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की ओर भागकर टाइम्स ऑफ इन्डिया की ओर गए ऐसी खबर मिलते ही करकरे अपने साथियों को लेकर वहां जांच हेतु पहुंचे। करकरे एटीएस के चीफ थे और ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए यह उन्हें खुद तय करना था और उन्होंने वही किया। अंतुले करकरे जैसे जांबाज से क्या उम्मीद रखते है? यह कि वे भी इस देश के नेताओं की तरह अपने बिलों में छिप जाये और आतंकवादी निर्दोष लोगों को मारकर चले जाये तब फांके मारने के लिए बाहर निकले? एक सच्चे पुलिस अधिकारी की तरह वे खुद आतंकवादियों को ढूंढने गये लेकिन बदनसीबी से अंधेरे के कारण पेड के पीछे छिपे आतंकवादी उन्हें नहीं दिखे। अंतुले के बयान में कोई दम नहीं और न ही शक की कोई गुंजाइश है। अंतुले केन्द्रीय मंत्री है और अगर कल को पाकिस्तान उनके बयान से चौंककर ऐसा कहे कि भारत सरकार का ही एक मंत्री कह रहा है कि मुंबई में पुलिस अधिकारियों को मारनेवाला पाकिस्तानी आतंकवादी नहीं थे भारत के ही हिन्दुवादी थे तब क्या कहोगे आप? अंतुले तो अपना पल्ला झाडकर चले जायेंगे लेकिन हिन्दुवादियों को आतंकी दिखाने की चेष्टा की कीमत कांग्रेस को ही चुकानी पडेगी।
उनकी टिप्पणियों से तो ऐसा लगता है कि वे भारत के मंत्री न होकर पाकिस्तान के मंत्री है। अंतुले ने तो इस हद तक कहा था कि आतंकवादियों के पास करकरे की हत्या करने के लिए कोई कारण ही नहीं था इसलिए उन्हें करकरे की हत्या के पीछे आशंका है। वैसे देखा जाये तो आतंकवादियों के पास निर्दोष लोगों को मौत देने के लिए भी कोई वजह नहीं थी। इसका मतलब यह हुआ कि मुंबई के हमलों में जो लोग मरे है उनकी हत्या भी आतंकवादियों ने नहीं की?
अंतुले का बयान मनमोहन सिंह सरकार की धज्जियां उडाने वाला है। करकरे आतंकवादी हमले में मारे गए है ऐसा सरकार ने घोषित किया था और अब उनकी सरकार का एक मंत्री सरकार के सामने सवाल उठा रहा है और वो भी लोकसभा में। ऐसी गुस्ताखी के लिए मनमोहन सिंह को तो ऐसे अंतुले जैसे लोगों को लात मारकर भगा देना चाहिए। जो इन्सान अपनी सरकार की कही बात के खिलाफ आपत्ति उठाये ऐसे लोगों को पार्टी में रखकर करना क्या है। अंतुले का बयान देशद्रोही बयान है। अंतुले जैसे कुत्तों के भौंकने पर करकरे जैसे शहीदों की शहादत की कीमत कतई कम नहीं होगी।
जाहिर सी बात है कि अंतुले के दिल में इन दिनों अपनी कौम के लिए ज्यादा प्यार उमड रहा है। उनकी बयानबाजी से आतंकवाद के सामने हमारी जंग कमजोर होती जा रही है। करकरे की मौत पर सवाल उठाकर अंतुले पाकिस्तान के हाथ में खेल रहे है। हमारा पडोशी देश अंतुले से खुश है। पाकिस्तानी अखबार उनकी प्रशंसा में जुटे है।
इस देश के राजनेताओं को आतंकवाद जैसे गंभीर मसलों में भी वोटबैंक के लाभ के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता इसका यह सुबूत है। अंतुले खुद मुस्लिम है इसलिए उन्हें मुस्लिम वोटों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा। एक बात तो बताना ही भूल गई कि अंतुले ने ऐसा बयान पहली बार नहीं दिया है। वर्ष 2006 में कैबिनेट की बैठक में उन्होंने महाराष्ट्र के नांदेड में हिन्दुवादियों ने ब्लास्ट करवाया है ऐसी टिप्पणी की और उस वक्त भी उन्होंने सरकार की हालत पतली कर दी थी। कल तक इस शख्स को कोई नहीं जानता था। केन्द्र में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री है लेकिन अभी तक उन्होंने इस मंत्रालय में कोई काम नहीं किया। मुस्लिम समाज भी इस मंत्री से अनजान है। दूसरे शब्दों में कहे तो वे भी सिर्फ नाम के ही मंत्री है।
शाबाश मि. अंतुले! आपके दिमाग और इन्वेस्टीगेशन वकीलात के लिए सभी भारतीयों को आप पर नाज है। मुंबई में आतंकवादियों ने लोगों को खून से नहला दिया। पूरा मुंबई आतंक के बारूद पर बैठकर थर-थर कांप रहा था। लोग डरे हुए थे और ऐसी स्थिति में सिर्फ दस मिनट में ही किसी हिन्दुवादी संगठन ने करकरे को मौत की नींद सुलाने का प्लान बना लिया, कुछ ही मिनटों में हत्यारों की फौज तैयार कर दी और कुछ ही मिनटों में करकरे का लोकेशन ढूंढ लिया और पलभर में ही ए.के.47 की व्यवस्था कर करकरे के हेल्मेट के आरपार गोलीयां चला दी। ऐसी आपकी थियरी जानने के बाद सवाल पूछना चाहती हूं कि आपको वकील बनाया किसने?
मुंबई वारदात के बाद देश का बहुजन मुस्लिम समाज खुद दु:खी है। मृतकों के आत्मा की शांति के लिए मुस्लिमों ने जगह-जगह बंदगी की है। आपकी इस गंदी टिप्पणी से न ही कांग्रेस खुश हुआ है और न ही मुस्लिम समाज लेकिन हां! आपने पाकिस्तान को जरूरत से ज्यादा खुशी दे दी है।
मुझे तो लगता है अंतुले पाकिस्तान के आईएसएस के भारतीय एजेन्ट है। यह बेहद अफसोस की बात है। अंतुले को अगर मुस्लिमों का मसीहा बनना ही था तो उनके पास और भी मुद्दे थे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर रहकर भ्रष्टाचार कर जो करोडों रुपये जमा किये है उन रुपयों को मुस्लिम बच्चों की पढाई में खर्च करना चाहिए था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने कहा है कि हेमंत करकरे और उनके दो साथी पाकिस्तान से आए आतंकवादियों के गोलियों से शहीद हुए है। अब इन दोनों में से सही कौन? दिल्ली के मंत्री या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री?
अब बात करते है जेठमलानी की। अंतुले ने जो बयान दिया उसे जेठमलानी ने कुछ ओर तरीके से पेश किया है। मुंबई में हुए आतंकी हमले के वक्त अनगिनत लोगों की लाशें बिछाकर भाग रहे अजमल कसाब नामक आतंकी पुलिस के हाथों पकडा गया। यह कसाब पाकिस्तानी है, हत्यारा है। और इस हत्यारे के सामने मुंबई की कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल होनेवाला है लेकिन समस्या यह है कि उसकी ओर से कोर्ट में एक भी वकील मुकद्दमा लडने को तैयार नहीं है। इसबार इन वकीलों में देशप्रेम का जुनून सवार है। इसलिए मुंबई बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पारित किया है इसलिए कसाब का केस कोई वकील नहीं लडेगा। इस प्रस्ताव के कारण जेठमलानी ने अपना बयान देते हुए कहा है कि कसाब को अपना बचाव करने का पूरा हक है। जिसने बेरहमी से इतने सारे लोगों को मौत की नींद सुलाया हो। जो इस देश के सामने जंग छेडने की बात करता हो। जो इस देश के कानूनों को नहीं मानता क्या उसे अपने बचाव का हक है? मुस्लिम बिरादर को पूछे जाने पर कि कसाब को कैसी सजा देनी चाहिए पर उन्होंने क्या कहा पता है कि कसाब पर कोई मुकद्दमा न चलाकर उसे तुरंत फांसी दे देनी चाहिए। और मेरी इस बात में पूरा देश सहमत होगा। मुझे अफसोस रहेगा कि हमें आतंकवादियों के लिए हमदर्द ढूंढने ओर कही जाने की जरुरत नहीं है।
अंतुले से मेरी दरख्वास्त है कि वे हिन्दू-मुस्लिम आतंकवाद के चक्कर में न पडे। देश को धार्मिक आधार पर बांटने का प्रयास छोड दें। और जितनी जल्द हो सके वह अल्पसंख्यक मंत्रालय को किसी अच्छे, सच्चे, ईमानदार व्यक्ति के लिए छोड दें और पाकिस्तान चले जाये।
अंत में, जब अंतुले का सिमेन्ट कौभांड का भांडा फूटा था तब एक झुमला चला था...
कुछ सोने से तुले, कुछ चांदी से तुले
रह गये थे अन-तुले, वो सिमेन्ट से तुले
जय हिंद

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

आडवाणी को क्या हक है ?


मुंबई पर हुए आतंकी हमले से अभी देश पूरी तरह उभरा भी नहीं है। ऐसी स्थिति के चलते राजनैतिक तमाशा करने वाले कुछेक राजनेता अपना बनावटी गुस्सा दिखाने में मशगुल हो गये है। लगता है इन सभी की अंतरात्मा अचानक ही जाग गई हो। और इन नेताओं का इस्तीफों का दौर चल रहा है। मनमोहन सरकार द्वारा शिवराज पाटिल को चलता करना और पी. चिदंबरम को गृहमंत्री बनाना वही दूसरी और शरद पवार ने उनकी पार्टी के आर.आर.पाटिल को रवाना कर दिया है और अपने भतीजे अजित पवार को उपमुख्यमंत्री पद पर बिठाने की रणनीति बनाई है। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की बलि चढ गई है। देशमुख के स्थान पर किसे रखना है इसका निर्णय मेडम सोनिया तय करे इतनी ही देर है। सुशील कुमार शिंदे और पृथ्वीराज चौहान के नामों की चर्चा चल रही है। इस निर्णय से कोई ज्यादा फर्क पडने वाला नहीं है। यह तो राहु की जगह केतु को बिठाने जैसा हुआ। एक ओर कांग्रेस और मनमोहन सिंह यह अर्थहीन काम कर समय बरबाद करने में व्यस्त है तब भाजपा का ड्रामा शुरु हो गया है। अब जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर है तब भाजपा की सोच है कि मनमोहन सरकार आतंकवाद के सामने लडने में पूरी तरह विफल गई है और उसे बैठे बिठाये अच्छा खासा मुद्दा मिल गया है और इस कारण वह पूरे जोश में इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने में लगी है। भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए पहले ही आडवाणी का नाम घोषित किया है इसलिए स्वाभाविक है कि आडवाणी सबसे ज्यादा जोश में है और इस कारण सबसे ज्यादा फूदक रहे है।
आडवाणी को ऐसा लग रहा है मानो उन्हें अभी से ही प्रधानमंत्री पद मिल गया हो। यह बात सही है कि अभी केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है और मुंबई में हुए हमले के लिए वह जिम्मेदार है लेकिन भाजपा को और खासकर आडवाणी को आतंकवाद के मुद्दे पर कुछ भी कहने का अधिकार है ? जर्रा सा भी नहीं। आडवाणी और भाजपा के नेतागण आज चाहे इतने फाके मारते हो और मर्दानगी दिखा रहे हो लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अभी देश में आतंकवाद के लिए जितनी कांग्रेस सरकार जिम्मेदार है उतनी ही जिम्मेदार मनमोहन सिंह के पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी सरकार भी है और अगर देश में हुए आतंकवाद के लिए हम शिवराज पाटिल को पेट भरकर गालियां दे सकते है तो आडवाणी भी उतने ही नहीं बल्कि उससे भी ज्यादा गालियां खाने के हकदार है क्योंकि शिवराज पाटिल के कार्यकाल के दौरान जितने आतंकवादी हमले हुए उससे भी ज्यादा हमले आडवाणी के गृहमंत्री पद के कार्यकाल के दौरान हुए थे। सबसे ज्यादा शर्मनाक तो यह है कि शिवराज पाटिल ने नैतिकता का नाटक कर गृहमंत्री पद छोड दिया जबकि आडवाणी तो एक के बाद एक हमले होने के बावजूद भी गृहमंत्री पद से चिटके रहे थे। बेशर्मी की हद तो वह थी कि उन्होंने प्रमोशन लिया था और गृहमंत्री में से उपप्रधानमंत्री बन गए थे। आज वही आडवाणी अपनी चतुराई दिखाकर आतंकवाद से लडने की सलाह दे रहे है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आडवाणी किस मुंह से यह बात कह रहे है। ऐसा कहा जाता है कि राजनीतिज्ञों की खाल मोटी होती है और आडवाणी इस बात का सबूत है।
आडवाणी छह साल तक गृहमंत्री पद पर रहे और इस देश के लिए यह समय आतंकवाद से मुकाबला करने में सबसे ज्यादा खराब समय रहा था। इस देश में काश्मीर, पंजाब या उत्तर-पूर्व के राज्यों में आतंकवाद था लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र या उत्तर-दक्षिण भारत के राज्यों में आतंकवाद नहीं था। इन क्षेत्रों में आतंकवाद की शुरुआत 1998 में लोकसभा चुनाव से पहले कोयम्बतुर में सिरियल ब्लास्ट से हुई। यह हमला आडवाणी को टारगेट बनाकर किया गया था। इस हमले के बाद तुरंत केन्द्र में भाजपा की सरकार थी और आडवाणी गृहमंत्री थे और वास्तव में आडवाणी को आतंक का दानव उसी वक्त कुचल देना चाहिए था लेकिन आडवाणी ने उस वक्त हिम्मत नहीं दिखाई और उसकी किमत हम सब आज चुका रहे है। 1998 से 2004 के मई तक केन्द्र में भाजपा की सरकार थी और आडवाणी गृहमंत्री थे और इस समय के दौरान देश में आतंकवाद की 36 हजार से ज्यादा वारदातें हुई और 12 हजार से भी ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई। इन वारदातों को रोकने में आडवाणी पूरी तरह विफल गए थे।
आडवाणी के कार्यकाल में आतंकवाद की चरमसीमा देखने को मिली थी और इस देश की संसद पर हमला हुआ था, भारतीय सेना का जहा हेडक्वार्टर है उस लाल किले पर हमला हुआ था और बावजूद इसके आडवाणी ने हाथ पर हाथ धरे बैठने के अलावा कुछ भी नहीं किया था। मुंबई के हमले से वह हमला ज्यादा बडा था और वह हमला हमारे स्वाभिमान पर हुआ था। वास्तव में उस वक्त ही आतंकवादियों को पालनेवालों को मुंहतोड जवाब देना चाहिए था उन्हें उनकी नानी याद दिलाने की जरुरत थी। इस काम को अंजाम देने वाले आतंकवादी पाकिस्तानी थे और आईएसआई ने उन्हें भेजा था उसके सबूत मौजूद होने के बावजूद भी आडवाणी या भाजपा सरकार पाकिस्तान पर आक्रमण की बात तो दूर उनकी पूंछ पकडे रहने में मशगुल रही। उनके साथ दोस्ती के ख्वाब देखती रही।
भाजपा के शासनकाल के दौरान इस देश के लोगों का राष्ट्राभिमान चकनाचूर हो जाये ऐसी दो वारदातें भी हुई। 1998 में ही वाजपेयी उपप्रधानमंत्री थे तब पाकिस्तान ने आतंकवादियों के बलबूते पर कारगिल पर कब्जा करने की कोशिश की उस समय काश्मीर के अंदर घुस आए आतंकवादी सही सलामत पाकिस्तान पहुंचे इसकी व्यवस्था वाजपेयी सरकार ने की थी। उस समय इस देश में घुस आए आतंकवादियों की कब्र वही पर बनाने की जरुरत थी लेकिन वाजपेयी ने उन्हें जाने दिया। भारत के पास आतंकवाद से लडने की ताकत नहीं है इसका यह पहला सबूत था। ऐसी दूसरी वारदात कंदहार विमान कांड था। पांच आतंकवादियों ने हमारे विमान का अपहरण किया और प्रवासियों के बदले में तीन खूंखार आतंकवादियों की मांग की तब भी हमने घूटने टेक दिये थे। हमारे देश के विदेश मंत्री बैंडबाजे के साथ खास विमान में इन तीन आतंकवादियों को कंदहार ले गए और उन्हें सौंप कर हमारी इज्जत की धज्जियां उडा आए। उस वक्त भी आडवाणी उपप्रधानमंत्री थे। यह सब देखने के बाद आडवाणी को सोचना चाहिए कि क्या उन्हें आतंकवाद के सामने बोलने का हक है? आडवाणी और उनके जैसे भाजपा के नेता आज आतंकवाद के सामने लडने की बात आती है तब ‘पोटा’ और अन्य कहानियां शुरु कर देते है। भाजपा के छह साल के शासन काल के दौरान पोटा भी था और पावर भी था तब वाजपेयी सरकार आतंकवाद को क्यों रोक नहीं पाई?
आतंकवाद को रोकने के लिए इच्छाशक्ति चाहिए, आक्रमकता चाहिए उसके लिए जरुरी नहीं कि आप किस पार्टी से हो। और यह काम आडवाणी या मनमोहन जैसे नेताओं के बस की बात नहीं है। 1971 में स्व। इन्दिरा गांधी ने अमरिका के पश्चिम के दूसरे देशों की धमकियों को भूल कर पाकिस्तान पर हमला करवाया और एक साथ पाकिस्तान के दो टुकडे कर दिये थे। 1984 में स्व. इन्दिरा ने पलभर में निर्णय लेकर सुवर्ण मंदिर में सेना भेजकर आतंकवादी भिंडरानवाले और उनके साथियों की लाशें बिछा दी थी। मनमोहन उसी कांग्रेस के प्रधानमंत्री है फिर भी वह न पाकिस्तान पर हमला कर सकते है और न ही आतंकवादियों को उनकी नानी याद दिला सकते है क्योंकि उनके अंदर स्व.इन्दिरा जैसी मर्दानगी या जज्बा नहीं है। आडवाणी भी उसी केटेगरी के है। यह उन्होंने 1998 से 2004 के दौरान साबित कर दिखाया है। अफसरशाही से अलग आज तक न कोई मंत्री कुछ सोच पाया है और न सोच पाएगा। असल में देश में मंत्रियों की ऐसी फौज काम कर रही है जो किसी काम की नहीं। न उनमें सूझबूझ है और न ही योग्यता।
आतंक के आगे हिंदुस्तान कभी हारेगा नहीं
सत्य जीतता रहेगा सत्ता हारती रहेगी
जय हिंद

रविवार, 30 नवंबर 2008

इमेज नहीं देश बचाओ

मुंबई के आतंकवादी हमले से अवाक केन्द्र की मनमोहन सरकार अब धीरे-धीरे डेमेज कंट्रोल करने में जुट गई है। और इसकी शुरुआत हुई है शिवराज पाटिल से। पाटिल को गृहमंत्री पद से हटा यह पद चिदंबरम को सौंपा गया है। चिदंबरम आर्थिक बाबत में निष्णात है और उन्हें खुद भी मनमोहन सरकार के इस फैसले से झटका जरुर लगा होगा। अभी चहुओर आग ही आग है और शिवराज पाटिल ने उनके कार्यकाल के साढे चार साल में खाने-पीने और कपडे बदलने के अलावा कुछ नहीं किया उस कारण गृह मंत्रालय बिन मां का हो गया है। ऐसी स्थिति में चिदंबरम कोई कमाल कर दिखाये ऐसी उम्मीद रखना भी बहुत ज्यादा है। एक तरह से देखें तो मनमोहन सिंह ने उन्हें जलता हुआ घर सौंपा है। और इस जलते हुए घर की आग बुझाने में चिदंबरम खुद जल जाये ऐसी संभावना ज्यादा है। चूंकि इसमें कोई शक नहीं कि शिवराज पाटिल जैसे निकम्मे गृहमंत्री से तो चिदंबरम ज्यादा बेहतर गृहमंत्री साबित होंगे। लेकिन उनसे ज्यादा उम्मीद रखना नाइन्साफी है। जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी अर्थशास्त्र की पोथियों के गुजारी हो वह आतंकवाद से मुकाबला कर पायेगा ? लेकिन कभी-कभार ऐसा भी देखा गया है कि जिससे हमें कोई उम्मीद नहीं होती वह नामुमकिन काम कर जाते है और चिदंबरम भी ऐसा कुछ कर दिखाए ऐसी उम्मीद हम रखते है।
शिवराज पाटिल को घर भेजना सही कदम है लेकिन इसके लिए मनमोहन सिंह या कांग्रेस को शाबाशी देना सही नहीं। शिवराज पाटिल को घर भेजने में मनमोहन सिंह ने बहुत देर कर दी और उसकी बडी किमत इस देश के लोगों ने चुकाई है। मैं मीन मेख नहीं निकाल रही हूं और अब गडे हुए मुरदों को उखाडने से कोई फायदा भी नहीं है। क्योंकि इससे दर्द के सिवा हमें कुछ नहीं मिलनेवाला। लेकिन इसका उल्लेख इसलिए जरुरी है कि यह मनमोहन की ढुलमुल नीति का प्रतिबिंब है। शिवराज पाटिल को बहुत पहेले ही घर भेज देना चाहिए था लेकिन मनमोहन सिंह यह नहीं कर सके और अभी भी वे वही रास्ता और नीति अपना रहे है। आतंकवादियों ने हमारे देश का नाक काट दिया बावजूद इसके वे वही ढुलमुल रणनीति चला रहे है।
मुंबई के हमले के बाद शिवराज पाटिल को पद से हटाने या अन्य दो-चार अधिकारियों को या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को हटाने की जरुरत नहीं लेकिन आतंकवादियों को उनकी नानी याद आ जाये ऐसा कुछ करना चाहिए और मनमोहन सिंह से यही नहीं हो पा रहा। आतंकवादी हमारी ओर आंख उठाने की हिम्मत ना करे ऐसा कुछ करने के बजाय मनमोहन सिंह अभी गृहमंत्री बदलने और ऐसे कुछेक निर्णय लेकर संतोष मान रहे है। मनमोहन सिंह को फिलहाल कुछ ओर करने के बजाय आतंकवादियों को पालने वाले पाकिस्तान को मुंहतोड जवाब देना चाहिए जिससे पाकिस्तान हमारे देश को तबाह करने के लिए हजार बार सोचने को मजबूर हो जाये। और इसके लिए हिम्मत की जरुरत होती है। जो मनमोहन सरकार में दिखाई नहीं दे रही।
अभी के हालातों को देखते हुए पाकिस्तान द्वारा हजम किये काश्मीर पर हमला करने के अलावा ओर कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। लेकिन यही समझ में नहीं आ रहा है कि मनमोहन सरकार किस सोच में डूबी हुई है। हमारे शासक के कानों तक शायद हम आम लोगों की आवाज ना पहुंचे लेकिन गांधी खानदान के लोगों की बात भी उनके कानों तक नहीं पहुच रही। मुंबई के आतंकवादी हमले के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के निवेदन कुछ इस प्रकार है। राहुल ने साफ शब्दों में कहा है कि इस आतंकवादी हमले में पाकिस्तान या अन्य किसी भी देश का हाथ हो, भारत को तमाचे का जवाब तमाचे से देना चाहिए। और इसमें प्रियंका दो कदम आगे है। उन्होंने कहा कि आज उनकी दादी इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री होती और इस तरह आतंकवादी हमला होता तो इन्दिरा ने उन्हें बहादुरी से जवाब दिया होता। राहुल और प्रियंका सार्वजनिक जीवन में है और सत्ता पे उनकी सरकार है। इसलिए उन्हें अपनी जुबान को लगाम देना पडता है लेकिन फिर भी उन्होंने थोडे से शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है। राहुल और प्रियंका जो कुछ भी सोच रहे है यह उनकी सोच से ज्यादा जन आक्रोश है और यह बात मनमोहन सिंह की समझ में नहीं आ रहा। आज सामान्य कांग्रेसी भी मनमोहन सिंह की इस ढुलमुल नीति से नाखुश है और यह कहने लगे है कि यह आतंकवाद से लडने के चिह्न नहीं है। मनमोहन सिंह यह सब सुनने के बावजूद ना समझे तो उनके जैसा कमजोर प्रधानमंत्री ओर कोई नहीं।
मनमोहन सिंह नहीं समझते तो कोई बात नहीं लेकिन कांग्रेस में ओर भी समझदार लोग मौजूद है उन्हें मनमोहन सिंह को समझाना चाहिए और ना समझे तो उन्हें घर का रास्ता दिखा देना चाहिए और जिसका खून खौल उठा हो और जो आतंकवादी को मुंहतोड जवाब दे सके ऐसे अन्य किसी को यह जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए। और यह इस देश का और कांग्रेस का अस्तित्व के लिए बेहद जरुरी है। राजनैतिक तौर पर कांग्रेस को इस निर्णय से जितना फायदा होगा वह अन्य किसी निर्णय से नहीं हो सकता। राजनैतिक लाभ के लिए मैं किसी पर आक्रमण करने की तरफदारी नहीं कर रही हूं लेकिन इस देश को आतंक के चंगुल से मुक्त कराने के लिए यह बेहद जरुरी है और अगर इससे कांग्रेस को फायदा पहुंचता है तो यह गलत भी नहीं है। पहली बात यह कि लोकसभा चुनाव में छ माह से भी कम समय बचा है और आतंकवाद का मुद्दा जिस तरह सामने खडा है उसे देखते हुए कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड सकता है। और दूसरी बात यह कि जिस तरह विपक्षी एवं अन्य लोगों ने कांग्रेस को आतंकवाद के लिए जिम्मेदार मुद्दे पर घेरा है उसे देखते हुए इसमें कुछ गलत भी नहीं क्योंकि जो सरकार उनकी हिफाजत करने में नाकाम रही हो और देश का दुश्मन कौन यह पता चलने के बावजूद हाथ पर हाथ धरे बैठी हो उसे लोग दोबारा क्यों चुनें ? लोगों को भी भरोसा दिलाना चाहिए कि इस सरकार में उनकी हिफाजत की ताकत है। फिलहाल इतना ही कहना चाहूंगी कि अभी जो स्थिति पैदा हुई है उसके चलते कांग्रेस को अपना इमेज बचाने के बजाय देश को बचाने के बारे में सोचना चाहिए।
Best of Luck Mr. Singh
जय हिंद

राजनीतिक दलों को वोट की चिंता है, देश की नहीं

मुंबई पर हुए आतंकी हमले पर बहुत कुछ लिखा गया है... बहुत कुछ सुना गया है। हमारा देश आतंकवादियों के लिए ‘खाला का घर’ हो गया है। तभी तो वे अपनी मर्जी से यहां आकर अपने नापाक इरादों पर अमल कर जाते है। हम एक अत्यंत लचर आंतरिक सुरक्षा तंत्र के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहे है। हमारे नाकारा रहनुमाओं ने देश को फिर से शर्मसार कर दिया। मुंबई के आतंकी हमलों ने देश के सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र के कामकाजों की पोल खोलकर रख दी है। हर आतंकी हमले के बाद अगली बार कडा रुख अपनाने का रटा रटाया जुमला फेंका जाता रहा है। आतंक से लडने के बजाय नेता फिर एक दूसरे पर कीचड उछालने में मसरुफ हो गये हैं। इन पोची बातों को सुनते-सुनते देश ने पिछले आठ महीनों में पैंसठ से ज्यादा हमले अपने सीने पर झेले है।
बयानबाजी के तीर एक दूसरे पर छोडने वाले नेताओं के लिए यह हमला वोटों के खजाने से ज्यादा कुछ नहीं। आतंकवाद के खिलाफ एकता की बस बातें हैं। एकजुटता प्रदर्शित करने को पार्टियां साथ नहीं आती। एकजुटता होनी चाहिए, कहने से आगे इनकी गाडी बढती ही नहीं है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा इस दिशा में एकजुटता दिखाने के लिए कोई ठोस पहल करने की जगह, सरकार को घेरने के लिए अनुकूल समय तलाश रही है। राजनीतिक दलों को वोट की चिंता है देश की नहीं। देश की चिंता होती तो आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता की कोशिश की बात ही नहीं होती। यह तो अपने आप होता। हमारी पूरी राजनीतिक जमात किस हद तक खोखली हो गई है, इसे रात के अंधेरे में भी साफ देखा जा सकता है।
सुना है कि मुसीबत के वक्त ही अपने पराए की पहचान होती है। भारत मां को तो निश्चित ही अपने इन लाडले सपूतों (नेताओं) की करतूतों पर शर्मिंदा होना पडा होगा। आतंकवादियों के गोला बारुद ने जितने जख्म नहीं दिए उससे ज्यादा तो इन कमजर्फों की कारगुजारियों ने सीना छलनी कर दिया।
ऐसा लगता है देश के सड गल चुके सिस्टम को बदलने के लिए अब लोगों को ही सडकों पर उतरना पडेगा। आतंकी हमारे सुरक्षा व्यवस्था की किरकिरी उडा रहे है जिससे लोगों का मनोबल टूट रहा है। लोग महसूस करने लगे हैं कि उनकी सरकार उनकी रक्षा करने में सक्षम नहीं है और यही आतंकवाद की सफलता है।
जो लोग (आतंकवादी) ‘बोट’ से आये थे उनसे ज्यादा खतरनाक तो वे लोग (नेता) है जो ‘वोट’ से आते है (चुने जाते है)। ऐसे नाजुक पल में भी नेताओं का महाभारत चल रहा है जो इस देश की लाचारी है।
मुंबई आतंक से मुक्त तो हो गया लेकिन सवाल यह है कि अब इसके बाद क्या ? इस मुक्ति के लिए हमने बहुत बडी किमत चुकाई है। हमारे जांबाज जवान, २०० निर्दोष भारतीय और करोडों का नुकसान। आतंकियों ने हमारे देश के स्वाभिमान को आत्मगौरव को चकनाचूर कर दिया। यह मुठ्ठीभर आतंकी भारत के १२० करोड लोगों के दिलों में दहशत पैदा कर गये। और हमें याद दिला गए कि हमारे पास रिढ की हड्डी नहीं है। इन आतंकियों को मार गिराने के बाद हम विजयोत्सव मना रहे है लेकिन क्या हम इसके काबिल है ? नहीं, क्योंकि हम नहीं वे जीते है। यह हर भारतीय के माथे पर कलंक है और इस कलंक को मिटाने के लिए जरुरी है आक्रमण। यहां बात पाकिस्तान ने हजम किए काश्मीर की हो रही है।
मुंबई में हुए आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ था। यह हमला करने वाले भी पाकिस्तानी थे। इन आतंकियों ने पाकिस्तान द्वारा हजम किए काश्मीर में प्रशिक्षण लिया। यह हमला जिस तरह से किया गया उसे देखते यह पांच या पंद्रह लोगों का काम नहीं है। यह बात कुछ हजम नहीं हुई कि पाकिस्तानी आतंकी समुद्र मार्ग से भारी मात्रा में विस्फोटक लेकर भारत में घुसे और किसी को कानो कान खबर तक नहीं हुई। पाकिस्तान के सहयोग के बिना इन आतंकियों ने हमें डरा दिया यह संभव नहीं। जिसे देखते हुए साफ है कि यह हमला पाकिस्तान ने ही करवाया है। इसलिए इस समय भारत को कुछ भी न सोचते हुए ‘अभी नहीं वो कभी नहीं’ का रुख अपनाना चाहिए। वैसे देखा जाए तो आतंकवाद के सामने लडने में हमारे शासक निक्कमे साबित हुए है लेकिन मनमोहन सिंह का रेकर्ड सबसे खराब है। देश में पिछले एक साल में आतंकवाद खूब फूला-फला है। आतंकवाद हमारे लिए नया विषय नहीं है लेकिन अब सहनशीलता की सारे हदें समाप्त हो गई है। आतंकवादी भी हमारी सहनशीलता की स्थिति भांप गए है।
यह समय मनमोहन सरकार के लिए चुनौती से कम नहीं। पिछले साढे चार सालों में मनमोहन सरकार ने आतंकवाद के सामने घुटने टेकने के अलावा कुछ नहीं किया है। अगर इस समय वे अपने फर्ज से चुक गये तो इतिहास उन्हें कभी भी माफ नहीं करेगा। इस देश के १२० करोड लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मनमोहन सरकार की है। और यह समय उस जिम्मेदारी को निभाने का है। जंग किसी समस्या का हल नहीं है लेकिन अगर कोई हमें बार बार ललकारे तो इसके अलावा कोई मार्ग नहीं बचता। पाकिस्तान वही कर रहा है और इस समय भारत को उसका मुंहतोड जवाब देना होगा। भारत पाकिस्तान पर हमला बोलेगा तो पाकिस्तान चुप्पी नहीं साध सकता इसके कारण काफी समस्याओं से मुकाबला करना पडेगा। और ऐसा न हो इसीलिए भारत को पाकिस्तान पर हमला करने के बजाय पाकिस्तान ने जिस काश्मीर को हजम कर लिया है वहीं जाकर हमला करना चाहिए। काश्मीर पाकिस्तान के बाप की जागिर नहीं है अगर पाकिस्तान ऐसा समझता है तो उसकी अकड को ठिकाने लाने की जरुरत है। भारतीय एयरफोर्स पाकिस्तान द्वारा हजम किए गए काश्मीर में घुसकर बमबारी करेगा उसके साथ ही पाकिस्तान और उसके दम पर उछलते आतंकवादी हरामजादों को भी एक मेसेज मिल जायेगा कि भारतीय शासकों ने अपने हाथों में चुडियां नहीं पहनी है। अगर वे भारत में घुसकर आतंक फैला सकते है तो भारत भी उनके घरों में घुसकर उन्हें सबक सिखाने की ताकत रखता है। भारत यह मर्दानगी बताये यह जरुरी है। देश के लोग जिस डर के बीच जी रहे है, सहमे हुए है और आतंकवादी का नाम सुनते ही उनके रौंगटे खडे हो जाते है उनके मनोबल को मजबूत करने और आत्मविश्वास जगाने के लिए ऐसा करना जरुरी है।
भारत हमला करेगा तो अन्य लोग क्या कहेंगे इसकी चिंता करने की भी जरुरत नहीं है। दूसरे देशों पर आतंकवादी हमले होते है तो क्या वे हमें पूछने आते है ? अलकायदा ने वल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला किया है ऐसी आशंका के चलते ही अमरिका ने अफघानिस्तान को तहस-नहस कर दिया था और आज भी अमरिका वही कर रही है। अलकायदा के आतंकी पाकिस्तान में पनाह ले रहे है ऐसी आशंका के चलते अमरिका पाकिस्तान में घुसकर बमबारी कर आई, पाकिस्तान में मिसाइल फेंक आई। क्या कर लिया पाकिस्तान ने। और जो करना हो करे उसके लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए। यह रोज-ब-रोज कुत्ते की मौत मरने से तो अच्छा है एक बार यह जंग हो ही जाए। अंकुश रेखा पार और काश्मीर पर कब्जा।
मनमोहन सरकार के लिए यह इतिहास बनाने का समय है। नेहरु से लेकर वाजपेयी तक के प्रधानमंत्रियों ने की हुई गलती को सुधारने का मौका है। खास कर पाकिस्तानी आतंकवाद ने जिन निर्दोष भारतीयों की जान ली है उन तमाम को सच्ची श्रध्धांजलि देने का समय है। आज हम इन शहीदों की शहादत से नहीं सीखेंगे तो हमारी आजादी बेकार हो जायेगी। दिनकर जी ने बहुत पहले कहा था, क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो।
समझे !
जय हिंद

दिखावा करना पाप है राज !

सहनशील भारत... सार्वभौम भारत... धर्मनिरपेक्ष भारत !
जिसने जो चाहा कर के चला गया। मुंबई आज पहली बार नहीं दहली है और ना ही देश का कोई हिस्सा अब दहशतगर्द से अछूता है।
अब क्यों शतुरमुर्ग बने बैठे हो राज ? क्यों चुप्पी साध ली तुम्हारी महाराष्ट्रवादिता ने ? मेरे सवालों का जवाब दो राज ! आज तुम्हारी ‘आमची मुंबई’ बम-बारूद से तहस-नहस हो गई है। पूरी मुंबई अवाक बन गई है इस रक्तपात से। चारों ओर बस खून ही खून है यहां। मरने वालों के परिवारजनों के करूण विलाप की चीखों पर आतंकवादी अट्टहास कर रहे होंगे। जिस तरह तुमने बिहार से आये छात्रों को सडकों पर दौडा-दौडा कर मारा था। किसी ओर प्रांत के लोगों से नफरत के नाम पर कई लोगों की जानें तुमने पिछले दिनों ली है और मरनेवालों के परिवारजनों के करूण विलाप पर तुमने भी ऐसा ही अट्टहास किया होगा ना !
महाराष्ट्र के नाम पर लोगों की कोमल भावनाओं को बहकाकर सत्ता की तमाम सीढियां नापी है ना राज! कभी तो देश के असली काम आओ भाई। इस देश में सिर्फ तुम ही नहीं यहां के सारे नेताओं ने पिछले साठ सालों में नफरत का बीज रोपने के अलावा कुछ नहीं किया। राज! तुम तो जब-तब अपनी गर्जना से देश के अखबारों की सुर्खियों में छाते रहते हो ना! ऐसे वक्त में कहां छिप गये हो। अभी महाराष्ट्र को तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी ही जरूरत है।
हमारे मिलेट्री के जवान में ज्यादातर उत्तर भारतीय है। आज इन जवानों के कारण ही मुंबई आतंक से मुक्त हो पाया है। इन्होंने अपनी जान पर खेलकर इस मुंबई को बचाया है राज। ये जवान तुम्हारी तरह नहीं सोचते। इनके लिए देश का हर हिस्सा इनका अपना है। ये देश को चाहने वाले है सत्ता को नहीं। इसलिए आज इनकी बदौलत मुंबई फिर से चलने लगी है। तुम्हें तो इनका शुक्रगुजार होना चाहिए, है ना! सलाम करो उन जवानों को राज !
जय हिंद

सोमवार, 10 नवंबर 2008

राहुल राज एन्काउन्टर केस : आमची पुलिस ?

बेस्ट एन्काउन्टर में मारे गए अपहरणकर्ता राहुल राज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसको काफी करीब से गोली मारने की आशंका जताई जा रही है। इस रिपोर्ट की वजह से इस केस में जबरदस्त मोड आ गया है। जे जे अस्पताल में फोरेंसिक मेडिसिन के सहायक प्रोफेसर डॉ. बीजी चिकलकर के मुताबिक राहुल के सिर में लगी गोली के पास से गन पाउडर के निशान मिले है, जो इशारा करते है कि उसे नजदीक से गोली मारी गई। राहुल के शरीर पर गोली के पांच निशान थे और इसमें से चार गोली राहुल के शरीर के आर-पार निकल गई थी। पुलिस को राहुल के शरीर में से सिर्फ एक गोली मिली है इसका मतलब भी यही होता है कि पुलिस ने राहुल को एकदम करीब से गोली मारी थी। पुलिस राहुल से उसका पिस्तोल ले सकती थी इतने करीब होने के बावजूद उसे राहुल को पकडने में नहीं बल्कि उसे एन्काउन्टर कर वाह-वाही लुटने में दिलचस्पी थी। पोस्टमार्टम के इस रिपोर्ट ने मुंबई पुलिस का फांडा फोड दिया है।
अब कुछ राजनेताओं की बात करते है। मुंबई पुलिस ने यह एन्काउन्टर किया उसके बाद महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल बहुत जोश में थे। उन्होंने मुंबई पुलिस की तारीफ में कसिदा पढने में कोई कसर नहीं छोडी। उन्होंने ऐसी घोषणा भी कर दी थी कि राहुल राज पागल था और कोई पागल इस तरह लोगों को परेशान करेगा तो उसका यही अंजाम होगा। राहुल का एन्काउन्टर सही है या गलत इस बारे में फैसला करने के लिए वह खुद ही अंतिम सत्ता पर है इस तरह पाटिल ने यह बात कह अपनी बेवकूफी को साबित किया है। यह बात ओर है कि एन्काउन्टर के एक हफ्ते बाद वे ठंडे हो गये है और महाराष्ट्र कैबिनेट बैठक में उन्होंने गुलांट मार कर कह दिया कि उन्होंने गोली का जवाब गोली से मिलेगा यह डायलोग आतंकवादियों के लिए कही थी, राहुल राज जैसे लडकों के लिए नहीं। पाटिल का यह ह्र्दय परिवर्तन क्यों हुआ यह समझना आसान है।
केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है और यह सरकार लालू जैसे लोगों के कारण टिकी हुई है। राहुल राज का एन्काउन्टर हुआ इसलिए लालू ने अपने तमाम सांसदों और विधायकों का इस्तीफा देने की घोषणा की इसके कारण कांग्रेसियों में भगदड मच गई है और वे लालू को मनाने में लग गये है। लालू को मनाने हेतु केन्द्र सरकार ने पाटिल को सूई चुभोई है और इस कारण पाटिल ऐसी समझदारीभरी बातें कर रहे है।
राहुल राज के एन्काउन्टर केस में दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है और अब क्या करना है यह केन्द्र सरकार के हाथ में है। राहुल का एन्काउन्टर सही था या गलत इस बात को एक ओर रख रखते है। अब बात कांग्रेस की नीति पर आकर रुकती है। गुजरात में पुलिस ने शोहराबुद्दीन नामक एक गेंगस्टर को एन्काउन्टर में उडा दिया और यह एन्काउन्टर नकली था ऐसा बाहर आने के बाद कांग्रेस ने इस मामले समग्र देश में हल्ला मचा दिया और इस मामले गुजरात की मोदी सरकार को हटाने की मांग की।
कांग्रेस ने सही किया या गलत इसकी चर्चा यहां अप्रस्तुत है क्योंकि यह नीति का मामला है और कांग्रेस को अपनी नीति तय करने का पूरा हक है। सवाल यह है कि कांग्रेस वही नीति राहुल राज एन्काउन्टर केस में लागू करती है या नहीं ? शोहराबुद्दीन गेंगस्टर था तो भी उसे मारने का पुलिस को कोई हक नहीं था ऐसा कहने वाले कांग्रेसी नेता राहुल राज नामक एक निर्दोष युवक के एन्काउन्टर के मामले भी यही बात करते है या नहीं ? केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की सरकार है। उनकी ही सरकार के गृहमंत्री ने इस एन्काउन्टर को सही बताया था। देखना यह है कि कांग्रेस भाजपा सरकार के लिए अलग नीति और अपनी सरकार के लिए अलग नीति रखती है या सभी को एक ही तराजू से तोलेगी। मेरी आवाज इस देश की जनता की आवाज है जो इन ऊंचे पदों पर बैठे लोगों से इस सवाल का जवाब चाहती है।
जय हिंद

शनिवार, 1 नवंबर 2008

करे कोई, भरे कोई

देखिए, हमारे देश के राजनेताओं को और जनता को। ये राजनेता अपने मतलब के लिए जनता को बहकाते है और ये बेवकूफ लोग उनकी बातों को मानकर भावुक बन जाते है। राजनेता तो आग लगाकर अपने-अपने महलों में आराम से सो जाते है और उनके इस लोमडियापन की किंमत बेचारी जनता चुकाती है। बात है गत सोमवार यानि २७ अक्टूबर की। इस दिन राहुल राज नामक एक बिहारी लडका मुठभेड में मारा गया। यह घटना मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने दस महिने पहले सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के सामने जो गाली-गलौच की उसका परिणाम है। राज ठाकरे ने अपनी वोट बैंक को मजबूत बनाने के चक्कर में महाराष्ट्रवाद का झंडा लेकर उत्तर भारतीयों को गालियां देना शुरु किया और उनके पीछे-पीछे महाराष्ट्रीयनों का एक समूह भी जुड गया। शुरुआत में यह हमला मर्यादित था और उस वक्त एकाद हफ्ते बाद महाराष्ट्र पुलिस ने राज ठाकरे को अंदर कर दिया बाद में राज ठंडा हो गया तब ऐसा लग रहा था कि मामला शांत हो जायेगा लेकिन वहीं रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने आए बिहारियों पर हमला हुआ और ज्वालामुखी भडक उठी। इस हमले के बाद चुप्पी साधे बैठे बिहारी भी मैदान में आ गये और उसके बाद ज्वालामुखी ने विराट स्वरुप ले लिया उसे देखते हुए लगता है कि यह मामला अब जल्द शांत होनेवाला नहीं है।
इन उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्रीयनों की खींचतान में २७ अक्टूबर को जो हुआ यह हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने आये बिहारियों पर हमला हुआ उसके बाद बिहारियों का खून खौल उठा है और अभी वे जोश में है। इस जोश में राहुल राज नामक एक बिहारी विद्यार्थी पिस्तोल लेकर मुंबई आया। गत २६ अक्टूबर को वह पिस्तोल लेकर कुर्ला पहुंचा और बेस्ट की डबल डेकर बस में चढा। बस में कंडक्टर ने टिकट मांगी और उसके साथ ही राहुल जोश में आ गया और उसने कंडक्टर के सामने पिस्तोल ताक दी। पिस्तोल देख कंडक्टर भडक उठा और लोगों का डरना स्वाभाविक था।
मिनटों में पूरी बस खाली हो गई और राहुल अकेला बस में बैठा रहा। इस तमाशे को देखने के लिए बस के इर्द-गिर्द लोगों की भीड जमने लगी और भीड देख राहुल जोश में आ गया। उसने राज ठाकरे के खिलाफ नारेबाजी शुरु की और राज ठाकरे को जो संदेश देना चाहता था उसकी घोषणा कर दी। हमारे यहां सामान्य तौर पर पुलिस ऐसी कोई वारदात के बाद आती है लेकिन यहां वक्त पर आ गई और पुलिस ने राहुल को चेतावनी दी। चूंकि राहुल ने चेतावनी नहीं मानी और सामने गोली चलाई इसलिए पुलिस को गोली चलानी पडी जिसमें राहुल की मौत हो गई। यह कहानी पुलिस के मुताबिक है। लेकिन राहुल के लिए जिन लोगों के दिल में हमदर्दी है वे कुछ ओर ही कह रहे है। उनके मुताबिक राहुल ने किसी को चोट नहीं पहुंचाया और ना ही उसका इरादा किसी को मारने का था। वह तो सिर्फ अपना विरोध दिखाना चाहता था और इसलिए उसने यह अनोखा रास्ता चुना लेकिन मुंबई पुलिस में भी सभी राज ठाकरे जैसी सोचवाले है इसलिए एक बिहारी को गोली मारने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलता सो उन्होंने राहुल को गोली मार दी। पुलिस चाहती तो राहुल को पकड सकती थी लेकिन पुलिस को राहुल को पकडने में नहीं मारने में दिलचस्पी थी इसलिए उन्होंने उसे पकडने की कोशिश तक नहीं की। ऐसा राहुल के लिए जिन्हें हमदर्दी है वे लोग कह रहे है और यह गलत भी नहीं है। टीवी पर इस वारदात का जो क्लिपिंग्स दिखाया गया है उसे देखते हुए लगता है कि पुलिस ने थोडी इन्सानियत दिखाकर बल के बजाय अक्ल से काम लिया होता तो राहुल मारा न जाता। राहुल बस में अकेला था और वह कोई आतंकवादी नहीं था कि गोली चलाये और किसी को भी मौत के घाट उतार दे। उसके पास पिस्तोल थी लेकिन उसे पिस्तोल चलाना आता था या नहीं यह भी एक सवाल है। ऐसी स्थिति में पुलिस उसे घेरकर अक्ल से काम ले सकती थी। राहुल के लिए जिन्हें हमदर्दी है वे लोग इस तरह सही है।
एक जवान लडका इस तरह छोटे से अपराध के लिए पुलिस की गोली खाकर बेमौत मारा जाये यह बडे शर्म की बात तो है लेकिन उससे ज्यादा तो हमारी आंखे खोलने वाली है। राज ठाकरे या दूसरा कोई भी राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए कोई भी तमाशा खडा करे और उनके सामने राज जैसे नेता अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करे लेकिन सवाल यह है कि इनकी वजह से आम जनता को भडकने की क्या जरुरत है? पुलिस इस मामले निश्चित ही अक्ल से काम ले सकती थी लेकिन बजाय इसके अगर राहुल पिस्तोल लेकर ही ना गया होता और ना ही यह तमाशा खडा करता और ना ही उसकी जान जाती। राहुल ने नेताओं के बहकावे में आकर हीरो बनने की कोशिश की और उसकी किंमत उसे जान गंवाकर चुकानी पडी। इसके लिए किसीको दोष देना भी ठीक नहीं है। राज ठाकरे जो तमाशा कर रहे है वह एकदम बकवास है उसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन राज की इस नौटंकी को बंद करने के लिए महाराष्ट्र सरकार बैठी है और उससे जो बन सकता है वह कर रही है। राहुल या अन्य किसीको राज ठाकरे को संदेश देने या पाठ पढाने के लिए मुंबई आने की क्या जरुरत है? राज को संदेश देना है तो उसके लिए दूसरे हजार रास्ते है लेकिन हाथ में पिस्तोल लेकर निकल पडो और लोगों को डराओ यह रास्ता ठीक नहीं। राज ठाकरे और उनके गुंडे यही काम करते है। और उनके सामने आप भी वहीं करोगे तो उनमें और आप में क्या फर्क रह जायेगा? गुंडागर्दी कर किसीकी हमदर्दी नहीं ली जा सकती और ना ही विरोध प्रदर्शित होता है।
मुंबई में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार है। गृहमंत्री आर.आर.पाटिल ने इस मुठभेड के बाद साफ शब्दों में कहा है कि पुलिस ने जो किया बिल्कुल सही है। कांग्रेस इस मामले क्या रवैया अपनाती है यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। गुजरात में पुलिस ने आतंकवादियों के साथ संलग्न शोहराबुद्दीन नामक एक गेंगस्टर को उडा दिया उस मामले पर कांग्रेस ने पूरे देश में उधम मचा दिया। मुंबई में पुलिस ने जिसे उडाया वह आतंकवादी भी नहीं है ना ही गेंगस्टर है। पुलिस उसे आसानी से पकड सकती थी। लेकिन पुलिस ने उसे उडा दिया और उनकी ही सरकार के गृहमंत्री उसका खुलेआम बचाव कर रहे है। शोहराबुद्दीन के एन्काउन्टर के मामले में गुजरात सरकार का इस्तीफा मांगने वाली कांग्रेस के लिए यह अग्नि परीक्षा की घडी है।
इस मामले राजनीति शुरु हो गई है। एक ओर एनसीपी है तो दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की पार्टी जनता दल (यु) है। बिहार की दूसरी पार्टियों को न चाहते हुए भी नीतिश के साथ रहना पडेगा क्योंकि सवाल वोट बैंक का है। चूंकि इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा खुश राज ठाकरे है। क्योंकि उन्होंने जिस मकसद से उत्तर भारतीयों के विरोध में विवाद छेडा था वह मकसद आखिरकार सफल होता दिख रहा है। राज को और कितना खुश करना है यह उत्तर भारतीयों और महाष्ट्रीयनों के हाथ में है।
जय हिंद