बुधवार, 17 सितंबर 2008

बिना नाक वाले पाटिल


गलियां जहां विरान और मोहल्ला है सुनसान
जिन्दा इंसानों की बस्तियां बन गई शमशान

कहीं आंख में नमीं थी, कहीं अश्क बही थी
हूकुमत के आगे आज आम इंसान परेशान

शैतानी बस्तियों से आया था कोई हैवान
भारत की रानी हो गई फिर से लहूलुहान

भोर में ना कोई शंख बजा ना शाम को आजान
लहू बहा जिन धर्मों का रंग था उनका एक समान

देश ने हाल के वर्षों में सिलसिलेवार बम धमाके झेले हैं। जयपुर, बंगलुरु, अहमदाबाद और अब दिल्ली। आतंकवादी हमलों के मद्देनजर सरकार की ओर से कोई मुक्कमल तैयारी नहीं दिख रही जो लगातार हो रहे धमाकों से पता चलता है। पांच दिन बीतने के बावजूद अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। सियासत कमान्डो के बीच सुरक्षित है, आम आदमी के जान की किसी को कोई परवाह नहीं है। मैं पूछती हूं कि क्या आम आदमी का लहू इतना सस्ता है? अभी जो तमाशा हो रहा है और जांच का नाटक खेला जा रहा है कुछ दिन बाद सब भुला दिया जायेगा। और इस आंतरिक सुरक्षा की नाकामी को देखते हुए पाटिल पर निशाना लाजिमी है। जिसे सरकार ने गंभीरता से लिया। बम ब्लास्ट गंभीर समस्या है। ऐसे गंभीर मसले पर चर्चा में पाटिल को शामिल नहीं किया गया। यही नहीं, उस बैठक में कई मंत्रियों ने उनकी कार्यशैली पर नाखुशी जताई। इससे पहले भी लालू यादव उनकी शिकायत सोनिया गांधी से कर चुके हैं। आतंकवाद के प्रति इस सुस्त नजरिये का संप्रग को अगले चुनाव में खामियाजा भुगतना पड सकता है। लिहाजा सत्ता के गलियारे में पाटिल की विदाई के कयास लगाए जा रहे हैं। इससे बडा अपमान क्या हो सकता है ! इनकी जगह कोई ओर होता तो कब का इस्तीफा दे चुका होता। लेकिन बिना नाक वाले पाटिल को कोई फर्क नहीं पडता। इन्हें तो चुल्लु भर पानी में डूब मरना चाहिए। इन्हें मान-अपमान की जरा सी भी परवाह नहीं है। कांग्रेस अगर वास्तव में पाटिल को गृहमंत्री पद से हटाना चाहती है तो यह इस देश पर बहुत बडा उपकार होगा।
शिवराज पाटिल एक असफल गृहमंत्री है। 2004 में इनके गृहमंत्री बनने के बाद ही देश में सबसे अधिक आतंकवादी हमले हुए है। 2004 से लेकर अब तक 12 जितने आतंकवादी हमले हुए है जबकि छोटे आतंकवादी हमलों की तो कोई गिनती ही नहीं हो सकती। शिवराज पाटिल के कार्यकाल से आतंकवाद देश के कोने-कोने में पहुंच गया। उनके कार्यकाल के दौरान हुए बडे हमलों पर गौर करें तो पता चलता है कि देश का एक भी बडा शहर आतंकवादी हमले से अछूता नहीं रहा। पाटिल मंत्रालय की सबसे बडी असफलता यह है कि सुरक्षा एजेंसी पूरी तरह विफल गई और एक भी हमले की इन सुरक्षा एजेंसियों को कानो-कान खबर नहीं हुई। इससे भी बडी असफलता तो यह है कि, अब तक उन जिम्मेदार लोगों को ढूंढने में वे सफल नहीं हो पाये। संसद पर 2001 में हुए हमले के केस में जिसे फांसी की सजा हुई है उस अफजल गुरु को फांसी देने में जो विलंब हो रहा है उसका जिम्मेदार भी पाटिल मंत्रालय ही है। डॉ. कलाम ने अफजल के फांसी की फाइल को 2003 में ही गृह मंत्रालय को भेज दिया था लेकिन उस फाइल को दबा दिया गया है जिसके जिम्मेदार पाटिल ही है।
सवाल केवल उनकी अकर्मण्यता का नहीं है। उनके ड्रेस सेंस का जो विवरण है वह बेहद चौंकाने वाला है। शनिवार को विस्फोट से पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में वह गुलाबी सूट में थे, विस्फोट के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए काले सूट में, और रात में घायलों को देखने जाते समय झक सफेद सूट में। नफासत बुरी चीज नहीं है, लेकिन त्रासवादियों के बीच यह आपकी संवेदनहीनता का भी सूचक है। जिस पर गृह सचिव यह कहकर जले में नमक छिडक रहे हैं कि हर हमले के बाद अनुभव बढता है। क्या आतंकवाद कोई प्रयोगशाला है, जिसमें हर हमले से सरकार सीख रही हैं? अपनी छवि की खास परवाह करने वाले गृहमंत्री अगर आतंकवाद को निर्मूल करने के बारे में भी सोचते, तो आज उनकी इतनी किरकिरी नहीं हो रही होती। अपने लिबास की उन्हें जितनी चिंता है, देश की सुरक्षा व्यवस्था की उतनी क्यों नहीं? यह हमारी सुरक्षा क्या खाक करेंगे। जिसकी किमत जनता अपनी जान गंवाकर चुका रही है।
पाटिल की असफलताओं का ग्राफ बहुत बडा है लेकिन दिल्ली ब्लास्ट के बाद वे सबके आंख में किरकिरी बन गए है। कांग्रेस में ही उन्हें हटाने के लिए माहौल बना हुआ है जिसके चलते यह फैसला जल्द से जल्द हो जाना चाहिए और इन्हें घर रवाना कर देना चाहिए। ऐसे गृहमंत्री की देश को कोई जरूरत नहीं है।
हमारे देश का गृहमंत्री कैसा होना चाहिए? जिसमें एक आग हो। जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता हो। पाटिल जैसा गृहमंत्री बिलकुल नहीं चलेगा। फीके-फीके मनमोहन सिंह को कडा रवैया अपनाना चाहिए। ऐसे गृहमंत्री को लात मार कर भगा देना चाहिए।
इस देश की राजनीति के आगे मेरी बौनी सी कलम कुछ भी नहीं है, लेकिन ये तो वक्त ही बतलायेगा कि किसकी चोट ज्यादा है और किसकी कम है। ये राजनेताओं के छिपे खेल तो दब जायेंगे लेकिन मेरी कलम में अंगारों से भरी स्याही कभी नहीं सुखेगी।
देश के सियासत में ऊंचे तख्त पर भेडिये ही भेडिये बिराजमान है। बात पगडी और टोपी की है। मेरी बोली कडवी जरुर है लेकिन यह समय की जरूरत है। राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रद्रोह की जंग जारी है। ये तो वक्त ही बतलायेगा कि किसको विजय मिलेगी।
न दोष किसी के देखो, न पोल किसी का खोलो...
स्वतंत्र के देश के नौजवानों, गांधी जी की जय बोलो...

जय हिंद

सोमवार, 8 सितंबर 2008

बिहार बाढ राहत पर राजनीति

आप सब सोच रहे होंगे कि, क्या बाढ पर राजनीति हो सकती है? जी हां, बिलकुल हो सकती है। हमारे देश का उसूल है, यहां सभी प्रकार की समस्याओं पर राजनीति की रोटी सेंकी जाती है। तो फिर हमारे माननीय नेतागण भला इस बाढ को कैसे छोड देते।
हम सब पिछले 21 दिन से पानी में डूबे गांव, खेत, रास्ते, घर और खाने पर टूटकर पडते अवश लोगों के समूह और पानी में खोए अपनों को तलाशती लगभग भरी हुई हजारों जोडी आंखों को लगातार देख रहे है। बिहार में हर बार बाढ आता है लेकिन इस बार की बाढ को राजनेता कैटरिना और सुनामी जैसा खतरनाक बता रहे है। हर बार की बाढ जीवन को सालों पीछे धकेल देती है।
वर्ष 1945 में कोसी योजना के तहत कोसी पर नेपाल से लेकर बिहार में गंगा के संगम तक दोनों किनारों पर 10 किलोमीटर लंबे तटबंध का प्रस्ताव बना था। पर यह तब तक फायदेमंद नहीं हो सकता था, जब तक नेपाल के बाराह इलाके में बांध नहीं बनाया जाता। तत्कालीन वायसराय लार्ड वेवल ने टेनेंसी वैली परियोजना की तर्ज पर काम शुरु करवाया, पर वह काम बिना कारण बताए बंद कर दिया गया। तब से आज तक बिहार की नदियों पर बने 3,454 किलोमीटर लंबे तटबंध टूटकर या लोगों द्वारा काटने से विनाश की कहानियां रच रहे हैं। हर साल यहां का 76 फीसदी इलाका बाढ में डूब जाता है, जो देश की कुल बाढ प्रभावित आबादी का 56 फीसदी है। इस समय अकेले उत्तर बिहार में 2,952 किलोमीटर लंबे तटबंध हैं, जिनके निर्माण में खरबों रुपये लगे हैं। लेकिन ये बाढ से बचाव के बजाय बाढ की विभीषिका के पर्याय बने हुए हैं। कोसी नदी के आसपास के लगभग 10 जिलों के 387 गांव इस बाढ की भेंट चढ चुके है।
वर्ष 1956 में नेपाल सरकार द्वारा भारत की सरहद पर विराट बांध बांधकर कोसी नदी के पानी को रोकने की कोशिश की गई थी। नेतागण का मानना था कि बांध बांधने से बाढ का पानी ज्यादा नहीं आ पायेगा। लेकिन अब उनकी समझ में आ जाना चाहिए कि इस तबाही का कारण ही बांध है। कोसी नदी ने भारत-नेपाल सीमा पर बने कुशहा बांध को तोड दिया और 200 वर्ष पुराने रास्ते पर फिर से बह चली। इस नदी को बिहार का शोक कहते है लेकिन कोसी किनारे के लोग इससे पूरी तरह सहमत नहीं। वे नदी और बाढ के साथ जीना सीख गए थे, पर विकासवादियों ने बाढ सहजीविता की उनकी कला ही नष्ट कर दी। नदी किनारे बसने वाला यह पानीदार समाज अब असहाय है। बाढ के साथ जीने वाले बांधों में कैद नदी की विभीषिका का अनुमान नहीं लगा पा रहे। वे असहाय बना दिए गए हैं। आज तैरने वाला समाज डूब रहा है।
तटबंधों की लंबाई, चौडाई और मोटाई से बाढ नहीं रुकती। बाढ अतिथि नहीं है, इसके आने की तिथियां बिलकुल तय है। लेकिन हमने विकास की पीठ पर सवारी करते-करते इस चेतावनी पर ध्यान ही नहीं दिया। पक्षों की बात को बाजु में रख शासक और तंत्र को सोचना चाहिए कि असली प्रगति और विकास किसे कहेंगे? अब जो बचा है उसे ही आगे बढाये यही काफी है। यह भी सही है कि रातोरात महल नहीं बन सकता। कछुए की तरह विकास होगा तो भी यह हमारे लिए कम नहीं।
बाढ से करीब 40 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित है। करीब 20 लाख लोग गायब भी बताए जा रहे है। ढाई लाख एकड कृषि भूमि का नुकसान हुआ है। राहत कैंपों की हालत खराब है। लोग वहां पत्ते खाकर किसी तरह जिंदा है। जहरीले जानवरों का डर अलग से है। उन्हें तत्काल भोजन, सिर छिपाने की जगह, दवा, पानी, कपडे, टेन्ट, चारपाई, केरोसिन, टॉर्च, दियासलाई आदि चाहिए। लोगों की आजीविका के मुख्य साधन पालतू और दूध देनेवाले पशु बाढ में बह गए है। गांव तो गांव छोटे-छोटे नगरों का कोई पता नहीं। बिहार में लगभग हरेक वर्ष खेती की दस लाख हेक्टेयर जमीन बाढ के पानी में तबाह होती है। करीब 2.5 करोड आबादी प्रत्येक वर्ष यह त्रासदी झेलती है। बडे पैमाने पर लोगों के विस्थापित होने, गर्म जलवायु और साफ-सफाई के अभाव सहित अन्य कारणों के चलते जलजनित रोगों के फैलने का खतरा बना हुआ है।
प्रधानमंत्री के हवाई दौरे ने एक अरब की सहायता राशि देकर इस बाढ को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। सरकारी कर्मकांड की लगभग सभी मुख्य रस्में पूरी कर दी गई। गले तक बाढ के पानी में डूबे लोग बेबस-बेकस हैं, लेकिन वे किसी भ्रम में नहीं हैं। उन्हें मालूम है कि सरकारी सहायता, राहत कार्य, राष्ट्रीय आपदा घोषणा आदि का मतलब क्या होता है। सभी जानते है। वर्ष 2002 में बाढ प्रभावित दरभंगा जिले के 18 प्रखंडों में सरकारी राहत महज 5.49 प्रतिशत लोगों तक ही पहुंच पाया था। इस बार एक अरब रुपये की सहायता और राष्ट्रीय आपदा का दरजा मिलने के बाद देखना है कि वहां राहत और बचाव कार्य कितना हो पाता है। राहत की घोषणा तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी की है। पर बिहार का सरकारी और गैर सरकारी तंत्र इस सहायता का लाभ प्रभावितों तक सचमुच पहुंचा पाएगा, इसका भरोसा बिहार के लोगों भी नहीं है। बिहार का आपदा प्रबंधन विभाग खुद ही लकवाग्रस्त है। वहां की सरकार भी खास कुशल नहीं रही। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें और स्वैच्छिक संस्थाएं काम पर लग गई है। लेकिन सवाल यह है कि 40 लाख से ज्यादा बाढ प्रभावित रहेंगे कहां? खाने-पीने के अलावा उनके बैठने-उठने की जगह भी ढूंढनी पडेगी। बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद उन्हें खाने-पीने की सामग्री तो मिल रही है, लेकिन ऐसी जगह ये लाखों लोग एक साथ कैसे रह सकते है? वहां प्रभावित लोगों को पलायन होने से रोकना सबसे बडा पुण्य होगा। क्योंकि, इससे दूसरे राज्यों में हालात बेकाबू हो सकते हैं। इसलिए किसी एक को नहीं, एक अरब लोगों को मिलकर मदद करनी चाहिए।
अब मुख्य विषय पर आते है कि इस बाढ से राजनीति का क्या लेना-देना। इसे भारत का दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि, देश में जब कभी कुदरती या मानवसर्जित आपदा आती है तब देश के माननीय नेतागण को राजनैतिक खिचडी पकाने का मौका मिल जाता है। एक-दूसरे पर कीचड उछालना... झूठ बोलना... इनकी रोजमर्रा की आदत में शुमार है। सभी पक्ष-प्रतिपक्ष एक दूसरे को बढ-चढ कर आगे लाने में जुट जाते है। अभी इस बात का मुख्य विषय से कोई लेना-देना नहीं लेकिन सिर्फ इतना ही कहूंगी कि ये लोग तो पराये देश में भी हमारे देश को नीचा दिखाने में पीछे नहीं हटते। सभी इस प्रलंयकारी बाढ प्रभावितों की राहत में जुटे हुए है और अपना-अपना सिक्का जमाने में लगे हुए है। लेकिन इसमें सबसे दिलचस्प और शर्मनाक किस्सा गुजरात राज्य का है। बताया जाता है कि गुजरात भाजपा अहमदाबाद सिरियल ब्लास्ट में मारे गए 55 लोगों के परिजनों को फूटी कोडी सहाय नहीं दे सकी और अब बिहार के बाढ प्रभावितों की मदद के लिए बढ-चढ कर उत्साह से काम पर लग गई है। लेकिन इनका तरीका बडा ही शर्मसार करने वाला है।
सिरियल ब्लास्ट में जो 55 लोग मारे गए उन्हें राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक परिवार को पांच-पांच लाख सहाय देने की घोषणा हुई थी। विपक्ष कांग्रेस ने प्रत्येक मृतकों के परिवार को एक-एक लाख दिए हैं। कांग्रेस ने मृतकों के परिवार के लिए घोषणा की तब भाजपा नेताओं को पूछा गया कि, भाजपा इन मृतकों के परिवार को कांग्रेस की तरह कोई सहाय देना चाहती है या नहीं? ऐसा पूछने पर उनका जवाब था कि, "हमारी सरकार ने रुपये दिए तो है। हम दें या हमारी सरकार दें बात तो एक ही है।" भाजपा के यह नेता भूल गए कि सरकार के रुपये भाजपा के नहीं है लेकिन जनता के पसीने की कमाई है। अहमदाबाद सिरियल ब्लास्ट के मृतकों के परिवार को एक रुपये की भी सहायता नहीं देने वाली भाजपा ने बिहार के बाढ प्रभावितों के लिए लोगों के पास जाकर पुराने कपडे नहीं लेकिन... नई साडियां, धोतियां, कंबल, गद्दीयां, बरतन इकठ्ठा करने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को सूचना दी है। बताया जाता है कि भाजपा लोगों से यह राहत सामग्री इकठ्ठा कर कीट बना उस पर अपना सिक्का लगाकर बिहार भेजेगी तब सहाय लेने वाली बिहार की जनता भाजपा के गुणगान गायेगी या गुजरात की जनता की? अनाम बनकर वहां बिना किसी प्रचार और दुंदभि के मदद करनी चाहिए कि लोग भूल जायें कि वहां बाढ आई थी। राहत पर राजनीति बाद में कर लीजिएगा। पहले इन चुनौतियों से तो निपटो। बहरहाल, सरकार क्या कर रही है, यह सवाल बेमानी है। हम क्या कर रहे हैं, यह सवाल मौजू है। लिहाजा, मानकर चलें कि बाढ हमारे अपने किसी के घर से होकर गुजरी है।
जय हिंद

बुधवार, 3 सितंबर 2008

BMW केस : भारत के न्यायतंत्र में देर सही पर अंधेर नहीं

बात है दिल्ली के BMW केस यानि, भारतीय नौकादल के भूतपूर्व प्रमुख ए एस एम नंदा के नाती संजीव नंदा की। संजीव नंदा 10 जनवरी 1999 को गुडगांव से अपने दोस्त मानेक कपूर के साथ पार्टी में से अपनी बहन की BMW कार में वापिस आ रहा था तब लोधी चेक पॉइन्ट पर पुलिस ने उसे कार रोकने को कहा लेकिन नशे में धूत संजीव नंदा ने कार को रोकने के बजाय पुलिस अधिकारियों पर कार चढा दी।
इस वारदात में चार कॉन्स्टेबल घटनास्थल पर ही मारे गए थे जबकि, दो ने अस्पताल में दम तोड दिया था। मनोज नामक एक युवक गंभीर रूप से घायल हुआ था। संजीव दुर्घटना के बाद कार रोककर नीचे उतरा था लेकिन मानेक के कहने पर वापिस कार में बैठ गया था और कार भगाकर उसके दोस्त सिध्धार्थ गुप्ता के घर पहुंचा था जहां कार की साफ-सफाई कर दी गई थी।
जबकि, घटनास्थल पर मिले कार के नंबर प्लेट के आधार पर संजीव ने दुर्घटना किए होने का रहस्य खुला था। सुनील कुलकर्णी नामक मुंबई के एक व्यापारी ने इस वारदात को अपनी आंखों से देखा था। बयान में उसने कहा था कि, उसने संजीव नंदा को कार चढाते हुए देखा है। जबकि, मनोज नामक युवक जो इस हादसे में बच गया था उसने अपने बयान में कहा कि, वह शायद ट्रक से घायल हुआ है। बयान देने के पश्चात मनोज रहस्यमय रूप से गायब हो गया था।
संजीव नंदा की इस केस में गिरफ्तारी हुई थी लेकिन बाद में इस रईसजादे को 15 करोड के जमानत पर छोड दिया गया था। इसके बाद संजीव नंदा भारत छोडकर फरार हो गया था। जबकि, GNFC बराक मिसाइल सौदे के केस में वह मार्च 2008 से जेल में है। 2007 में इस केस में दिल्ली की एक कोर्ट ने संजीव सहित तमाम सहयोगियों को सुबूत के अभाव में निर्दोष बरी कर दिया था।
अब बात करते है कि यह केस इतने सालों बाद किन कारणों से चर्चा में आया है। तो इसकी वजह है संजीव नंदा और उसके सहयोगी जो निर्दोष बरी हो गये थे वे किस तरह बरी हुए.... इसके पीछे क्या माजरा था। संजीव नंदा बडे बाप की बिगडी हुई औलाद है। और जैसे फिल्मों में हमें देखने को मिलता है उसी तरह इस बिगडी हुई औलाद को बचाने के लिए उसके बाप ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।
आर.के.आनंद की गिनती देश के जाने-माने वकीलों में होती है और संजीव के बाप ने अपने रईसजादे को बचाने के लिए आनंद को केस सौंपा था। आनंद ने बाकी सारे प्यादों को ठीक से जमा लिया था लेकिन एक रास्ते का रौडा था सुनिल कुलकर्णी। संजीव ने अपनी कार के नीचे जिन सात लोगों को कुचला था उसे सुनिल ने अपनी आंखों से देखा था और दूसरे गवाह बयान से मुकर गये थे तब भी सुनिल अपने बयान पर अडिग था। सवाल था कि अब सुनिल का क्या किया जाए। इस केस में पब्लिक प्रोसिक्यूटर के तौर पर आई.यु.खान नामक वकील थे और खान की आनंद के साथ पुरानी और अच्छी दोस्ती थी। इस केस में भी खान ने आनंद को तन, मन, धन से मदद की थी। आखिरकार, सुनिल को मनाने के लिए खान को मैदान में उतारना पडा। खान ने सुनिल को पैसों का ऑफर दिया। सुनिल ने ढाई करोड मांगे और फिर थोडी माथापच्ची हुई। जबकि,खान और आनंद को पता नहीं था कि, सुनिल उन्हें मामू बना रहा है और एक टीवी चैनल उनकी फिल्म उतार रही है। इस पूरे सौदेबाजी की फिल्म उतारी गई और बाद में चैनल ने आनंद और खान का भंडा फोड दिया। और पूरा स्टिंग ऑपरेशन दुनिया को दिखा दिया। एक अपराधी के वकील से मिलकर एक सरकारी वकील कैसे-कैसे कारनामों को अंजाम देता है उसे देख लोगों के दांतों तले ऊंगलियां दब गई थी।
इस मामले की तह तक पहुंचने में माननीय अदालत को नौ वर्ष का लंबा समय जरूर लगा, किंतु जो नतीजा निकला है, वह न्यायपालिका की नीर-क्षीर विवेकी क्षमता की पृष्टि करता है। पटियाला हाउस अदालत ने संजीव नंदा को गैर इरादतन हत्या का दोषी करार दिया है। यदि यह महज एक सडक दुर्घटना होती और दुर्घटना के लिए जिम्मेदार किसी ड्राइवर के खिलाफ केस चल रहा होता, तो शायद इसकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता। लेकिन यह एक ऐसी कहानी थी, जिसमें कुछ अमीर लोगों द्वारा बडी ह्रदयहीनता के साथ आम लोगों को कुचलने के बाद सुबूत नष्ट करने से लेकर छिपने-छिपाने और अदालत में मामले को अपने पक्ष में मोडने तक की भौंडी कोशिशें की गई थी। अमीरी के नशे में लोग सोचते हैं कि धन के जरिये वे कुछ भी खरीद सकते है। चूंकि अपने देश में ऐसा होता रहा है।
21 अगस्त 2008 को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर आनंद और खान दोनों की प्रैक्टिस पर चार महिने की पाबंदी लगा दी। देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों का कहना है कि, आनंद और खान ने जो गुल खिलाये और न्यायतंत्र को खरीदने की जो गुस्ताखी की है उसके सामने यह सजा बेहद सस्ती और मामूली है यानि कि, यह दोनों बहुत सस्ते दाम पर छूट गए।
हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है वह दो रूप से काबिलेतारीफ है। एक तो हाईकोर्ट ने मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन पर भरोसा किया और दूसरा यह कि, इससे इस देश की जनता में एक नेक संदेश जाता है कि, वकील चाहे बिकाऊ हो.... रईसों के तलवे चाटते हो.... उनके दलाल बनकर न्यायतंत्र को मजाक समझते हो लेकिन कानून बिकाऊ नहीं है...... पैसों के जोर का इस पर कोई असर नहीं हो सकता..... कानून अपना फर्ज नहीं भूला है।
और आज इस केस के अपराधियों को सजा सुनाई जानेवाली है तब देखना यह है कि, जहां पैसा बोलता है..... वहां इन्साफ क्या बोलता है।
यह सुखद संयोग ही है कि पिछले एक वर्ष के दौरान हमारी अदालतों ने लगभग सभी हाई-प्रोफाइल मुकदमों में दूध का दूध और पानी का पानी किया। BMW मामले में नंदा को दस वर्ष तक की जेल हो सकती है, लेकिन सवाल सजा की अवधि का नहीं, दोष पर मुहर लगने का था, ताकि समाज इससे सबक ले सके।
जय हिंद

शनिवार, 2 अगस्त 2008

...लडने की जिम्मेदारी किसकी ?

भारत जैसे आतंकवादियों का अभयारण्य बन गया है। जयपुर में विस्फोट... बंगलुरू थर्राया... आतंकवादी धमाकों से अहमदाबाद दहला... मुझे तो लगता है कि हम भारत में नहीं इराक या अफघानिस्तान में रह रहे है। दहशतगर्दो ने इन भीषण हमलों से झकझोर कर हमारी सरकारी नाकामी, सुरक्षा व्यवस्था की काहिली और खुफिया विफलता को उजागर किया है।
पिछले चार वर्षो में अयोध्या, दिल्ली, बनारस, गोरखपुर, हैदराबाद, बंगलुरू, मालेगांव, अजमेर, जयपुर और मुंबई में एक के बाद एक दिल दहला देने वाली घटनाएं घटी है। इतने बडे पैमाने पर लोगों की मिलीभगत होती है। सब जगह एक जैसा पेटर्न रहा है। हर बार कुछ लोग पकडे जाते है और जेबकतरों की तरह उनसे कुछ पूछताछ भी होती है, लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। सरकार उनके खिलाफ कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाती। वह चाहती भी नहीं क्योंकि निर्णयों में राजनीतिक जोखिम होते है। हमारी सरकारें देश के लिए नहीं, अपने निहित स्वार्थो के लिए काम करती है। बीच-बीच में खबरें आती है कि अब आईएसआई बांग्लादेशी आतंकी संगठन हूजी के जरिये यह सब करवा रहा है। लेकिन ऐसी कोई खबर आज तक नहीं आई कि हमारी एजेंसियां उनके खिलाफ क्या रणनीति अपना रही है।
कडे कानूनों का अभाव, राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी, ढुलमुल सरकार वाले देश में आतंकवादी कब अपनी साजिश को अंजाम दे देते है, किसी को कानो-कान खबर नहीं हो पाती। इस देश में आतंकवाद को धर्म के तराजू में तौला जाता है।
क्या बंगलुरू में मारे गए कन्नडियन का खून दिल्ली के सरोजिनी नगर में मारे गए पंजाबी के खून से जुदा है ? क्या बनारस में मारे गए व्यक्ति का खून हिंदू था, और मालेगांव में मारे गए व्यक्ति का खून मुस्लिम ? क्या मारे गए निर्दोष कांग्रेसी या भाजपाई होते हैं ? जिस तरह से हमारे राजनेताओं ने बम धमाकों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दी है, क्या उस भावना के साथ हम आतंकवादियों का मुकाबला कर पाएंगे ? क्या हमारी राजनीतिक नेतृत्व, हमारी ब्यूरोक्रेसी, हमारी सुरक्षा एजेंसियों के भीतर वह भावना है ? यदि होती, तो शायद आज हम इतने असहाय नहीं होते।
आतंकवादी गुट नई-नई रणनीतियां बना रहे है। नए-नए ठिकानों को निशाना बना रहे है। वे बाकायदा हमें चुनौती देते है कि हिम्मत है, तो हमें रोककर दिखाओ। लेकिन हमारे राजनेता एक-दूसरे की टांग खींचने में लगे हुए है। बम धमाकों के बाद नेतागण एक ही रिकार्ड बजा रहे है कि इस हमले के पीछे आतंकवादी संगठन का हाथ था। इसमें नया क्या है ? यह तो बच्चा-बच्चा जानता है। कोई ऐसा थोडे ही कहेगा कि यह हमला किसी महिला मंडल ने करवाया है। यह समय बयानबाजी का नहीं है, काम करने का है। जिसके लिए जनता ने आपको चुनकर भेजा है।
कुछ नजर डालें हमारी सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों पर... 1193 के मुंबई ब्लास्ट केस में 100 जितने दोषियों को सजा हुई लेकिन यह तो छोटी मछलियां है। दाउद इब्राहिम, टाइगर मेमन, छोटा शकील जैसे मुख्य अपराधियों का हम बाल भी बांका नहीं कर सके। यह लोग कभी पकडे जायेंगे और भारत की कोर्ट में इनके सामने केस चलेंगे ऐसी उम्मीद करना भी बेकार है। 1998 में लाल कृष्ण आडवाणी की सार्वजनिक सभा से पहले ही कोइम्बतुर बम धमाकों से दहला और लगातार 14 धमाके हुए। इस केस में अल उम्मा के सरगना बासा को उम्रकैद की सजा हुई है और दूसरे 150 से भी ज्यादा दोषियों को कोर्ट ने सजा सुनाई है। जबकि, इस केस का मुख्य सूत्रधार केरल का राजनीतिज्ञ और कट्टरवादी मुस्लिम नेता अब्दुल नसीर मधानी इस केस में निर्दोष बरी हो गए थे। मधानी दक्षिण भारत में आतंकवादियों का सबसे बडा आश्रयदाता माना जाता है। भारतीय संसद पर हमले के केस में अफजल गुरु को फांसी की सजा हुई है और अन्य दो को उम्रकैद लेकिन प्रो. गिलानी निर्दोष बरी हो गए थे। अफजल को फांसी देने में विलंब हो रहा है और संसद पर हमले जैसे अत्यंत गंभीर अपराध में जिसका हाथ है उसे छोड देने की वकालत हमारे देश की कुछेक राजनीतिक पार्टियां खुलेआम कर रही है। इन तीन केसों को छोड कोई केस निपटाया नहीं गया और 1993 से अभी तक हुए ऐसे बडे आतंकी हमलों के केसों की संख्या 15 से भी ज्यादा है। बडे पैमाने पर केसों में किसी की गिरफ्तारी भी नहीं हुई और जांच एजेंसियां आईएसआई या दूसरे आतंकवादी संगठन पर दोष डालकर पल्लू झाड लेती है। देश की राजधानी में 2005 के अक्टूबर में हुए सीरियल बम धमाकों के दोषियों को सामने लाने में केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियां आज तक सफल नहीं हो पाई है। समझौता एक्सप्रेस में पिछले साल फरवरी में हुए बम धमाकों के अलावा इन सभी बम धमाकों के पीछे हरकत-उल-जेहादी इस्लामिया का हाथ होने का अंदेशा है इसके बावजूद भी एजेंसियां मुख्य षडयंत्रकारी तक पहुंचने में नाकाम रही है। इस साल मई में जयपुर में हुए सीरियल बम धमाके का मामला भी आजतक सुलझाया नहीं जा सका है।
आतंकवाद बल से नहीं अक्ल से खत्म हो सकता है। आतंकवाद से निपटने में सैन्य कार्रवाई नहीं राजनीतिक सूझबूझ और मजबूत पुलिस-खुफिया तंत्र कारगर साबित हो सकता है। आंकडे और इतिहास बताता है कि आतंक से जुडे ज्यादातर मसले या तो राजनीतिक पहल से सुलझे है या फिर पुलिस और खुफिया तंत्र की मुस्तैदी से। आतंकवादियों को धार्मिक लडाकों की संज्ञा न देकर उन्हें सामान्य अपराधी समझकर कार्रवाई करनी चाहिए। क्योंकि इस समस्या का हल किसी जंग के मैदान में नहीं हो सकता।
हमारी खुफिया एजेंसियों को एक-दूसरे पर जवाबदेही डालने की आदत सी हो गई है। हर वारदात के बाद केन्द्र और प्रदेश सरकारें एक-दूसरे पर इल्जाम लगाती है, पर अफसोस है कि आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए कोई भी गंभीर नहीं है। प्रतिदिन या सप्ताह में महत्वपूर्ण स्थानों पर हमले की सूचना की खबर दे दी जाती है। पर कब और कहां यह कोई नहीं बताता। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने परमाणु केन्द्रों पर आतंकी हमलों की आशंका जता दी। सवाल यह है कि जब आपको यह पता है कि हमला हो सकता है, तो यह भी पता होना चाहिए कि हमला करने वाला कौन है। वह कहां है और इस वारदात को किस तरह अंजाम देगा। खुफिया एजेंसियों को इसकी कोई खबर नहीं होती और न ही वह इसका पता करने की जरूरत समझती है।
इन विस्फोटों के बाद हमेशा की तरह नेताओं की बयानबाजी हुई, मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे का ऐलान हुआ, मगर उन चेहरों के आंसुओं के पीछे छिपा दर्द और पीडा को शायद ही कोई पहचान पाए, जिन्होंने इन विस्फोटों में अपनो को खोया है।
खौफ में जी रही जनता... अस्पताल में दर्द से कराहते लोग... रुदन करते परिजन... चिथडों में लिपटी लाशें... आतंकवादियों के इस कायराना कृत्य से न जाने कितनी मांगे सूनी हो गई, कितने ही बच्चे अनाथ हो गए, कितनी ही माताओं की गोद उजड हो गई। लोग अपने घरों से काम पर निकलते तो हैं लेकिन लौटकर उनके क्षत-विक्षत शव आते है।
अहमदाबाद और सूरत में जो बम मिले है उसमें पुलिस या जांच एजेंसियों का कोई योगदान नहीं है लेकिन इसका श्रेय जनता को ही जाता है। जनता ही पुलिस को खबर देती है और ये अफसर लोग जैसे कोई बडा तीर मार दिया हो इस तरह अपना काफिला लेकर आ धमकते है। हाईअलर्ट करने और ऐसी घटनाओं का सख्ती से मुंहतोड जवाब दिए जाने का सरकारी रेडिमेड जवाब सुन-सुन कर जनता के कान पक गए है। पुलिस सिर्फ अंधेरे में तीर चला रही हैं। गत शनिवार के बम धमाकों के सप्ताह बितने के पश्चात पुलिस निश्चित सबूत प्राप्त नहीं कर सकी। जरा सोचें, समग्र देश में हाईअलर्ट के बावजूद मौत का सामान सूरत तक पहुंच गया। इससे साबित होता है कि यहां के प्रशासन को जंग लग चूका है।
इन वारदातों से लगता है कि भविष्य में दहशतगर्द हमारे घर में घूस कर हमें मार गिरायेंगे और यह पुलिस प्रशासन आराम से हमारा पंचनामा कर हमारा अंतिम संस्कार करने आ जायेगी। जिन्हें शहर में दहशतगर्द इतने धमाके कर जाए और तीन दिन लगातार मिल रहे बमों की कानो-कान खबर नहीं होती ऐसे लोगों से हम क्या उम्मीद कर सकते है। काश, हमारी खुफिया एजेंसियां मोसाद से और राजनेता गोल्डा माएर से कुछ सीख पाते।
अब हमारे क्राइम ब्रान्चवाले मौलाना हलीम नामक सिमी के किसी कार्यकर्ता को पकड लाये है और इस मौलाना के जरिये पाकिस्तान में प्रशिक्षण के लिए भेजे गए 33 युवकों का इस हमले के पीछे हाथ होने की बात हो रही है। सवाल यह है कि, यह 33 युवक हमारी आंखों को धोखा देकर आतंकवादी केम्पों में पहुंचे कैसे ?
गुजरात की जो स्थिति है उसका जवाब इस सवाल में है। हमारे यहां आतंकवाद जैसी कोई वारदात होती है कि फौरन मुस्लिम विरोधी माहौल पैदा हो जाता है। मुस्लिम आतंकवाद संगठनों से बडे पैमाने पर जुडे है यह बात सच है लेकिन सिर्फ मुसलमान इसके लिए जिम्मेदार है ऐसा कहना गलत होगा। इस देश में 80% बस्ती हिन्दूओं की है। सरकारी प्रशासन में 90% हिन्दू काम करते है, पुलिस, सेना, इन्टेलिजेन्स सभी में 90% हिन्दू है। मुस्लिम तो गिन-चुन कर 5% है और इसके बावजूद भी मौत का सामान बेरोकटोक पाकिस्तान से हमारे देश में घुस जाता है। यहां के युवक सरहद पार करके आतंकवादी ट्रेनिंग लेने पहुंच जाते है और यहां आकर धमाके कर लाशें बिछा जाते है। क्योंकि जो 90% है उनमें कुछेक गद्दार है और उनकी नमकहरामी की वजह से यह खूनी खेल खेला जाता है।
यह बात भले कडवी लगे, लेकिन 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। सोमनाथ थापा जैसे हिन्दू गद्दार न होते तो 1993 के धमाके नहीं होते। 1993 के धमाकों में 100 जितने दोषियों को सजा हुई उसमें 25 जितने हिन्दू है। यह हमारा इतिहास है। आतंकवाद के सामने लडना है तो पहले हमारे उन गद्दारों को ढूंढना पडेगा और बेनकाब करना पडेगा। इस मामले में जितनी मुसलमानों की जिम्मेदारी है उतनी ही हिन्दूओं की भी है।
हमारे देश में यह आम फैशन हो गया है कि आतंकवाद की कोई भी घटना होती है तो आईएसआई या फिर दाउद इब्राहिम या फिर बांग्लादेशी के मिलते-जुलते संगठन पर दोष मढ कर अपना पल्लू झाड लेने का। लेकिन यह कायराना कृत्य इस देश का नमक खाकर नमकहरामी करने वाले गद्दारों का है। इस देश में रहकर इस देश को नफरत करने वाले देशद्रोहियों का है।
बंगलुरू और अहमदाबाद के बम विस्फोट कम तीव्रतावाले थे, जिसमें बेहद सस्ता और आसानी से मिल जाने वाला अमोनियम नाइट्रेट, नट-बोल्ट और कील आदि का प्रयोग हुआ था। बंगलुरू में नौ बम धमाकों में दो ही लोग मारे गए। अहमदाबाद में 16 धमाकों में मरने वालों की संख्या भी कम है। इससे साफ होता है कि यह बम बनाने वाले अनगढ है इनमें ज्यादा कुशलता नहीं लेकिन इनके इरादे बेहद खतरनाक है। जिस तरह बमों को रक्खा गया वह स्थानीय लोगों के शामिल हुए बिना संभव नहीं था। हमारे देश में रहने वालों ने ही इस घटना को अंजाम देने वाले व्यक्तियों का साथ दिया है। उनके बिना बमों के निर्माण और उनको विभिन्न स्थानों पर रखने का कार्य नहीं हो सकता। क्या हमारे अपने ही लोग साजिश के पैरोकार बनते जा रहे है?
अफसोस ! ऐसा भी नहीं कि आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के पास संसाधनों की कमी है। विश्व की शीर्ष सैन्य शक्ति, परमाणु शक्ति संपन्न देश यदि आतंकवाद के सामने कमजोर दिखाई पड रहा है तो उसका सबसे अहम कारण है सशक्त राजनीतिक नेतृत्व की कमी और देश से ज्यादा दलीय हितों को महत्व देने वाले राजनीतिक दल।
मरने वाले तो मर गये लेकिन नेता अपनी रोटी सेंक रहे है और अधिकारी अपनी चमडी बचाने में मस्त है। ऐसे में आम जनता की सुरक्षा कैसे हो पायेगी ? ऐसी निकम्मी सरकार हमारी सुरक्षा कैसे कर सकती है ? अब हमें अपनी सुरक्षा खुद ही करनी पडेगी। भारतीय हरदम संघर्ष करता रहा है। इतिहास गवा है, आजादी के लिए संघर्ष, रोटी के लिए संघर्ष, हमारे अधिकारों के लिए संघर्ष और अब हमारी अपनी सुरक्षा के लिए भी हमें ही संघर्ष करना पडेगा। लडना पडेगा।
जय हिंद

शनिवार, 26 जुलाई 2008

हद कर दी आपने

सुनो गौर से बीजेपी वालों... बुरी नजर ना हम पे डालो... चाहे जितना जोर लगा लो... सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी... नहीं मैं गलत नहीं हूं, गाना सही है, आज देश का बदला हुआ मंजर देखकर तो यही गाना हर भारतीय को गुनगुनाना चाहिए।
किसी ने ऐसी कल्पना नहीं की थी कि, उनकी आंखें ऐसा दृश्य देखेंगी, जो बरसों तक हमें शर्मसार करता रहेगा। २२ जुलाई को लोकसभा में विश्वास मत को लेकर जारी उबाऊ बहस खत्म होनेवाला था। एक घंटे बाद प्रधानमंत्री को जवाब देना था और उसके बाद वोट पडने थे। पर ठीक चार बजे अचानक एक बैग खुला। और कई 'माननीय' नोटों की गड्डियां हो-हल्ले के साथ प्रदर्शित करने लगे। देश और विदेश के लाखों लोग टेलीविजन पर यह तमाशा देख रहे थे। भाषाई मर्यादा की सीमाएं लांघते हुए शब्द उछले कि तीन सांसदों को अपनी पार्टी से दगा करने के लिए नौ करोड की पेशकश की गई। उस समय पूरे देश की मुठ्ठियां भिंच गई थी।
दिल्ली के संसद में जो तमाशा हुआ उसमें एक्शन, रिएक्शन, रिवेन्ज, स्केन्डल, लाफ्टर और धोखा-फिटकार से भरा देश के सांसदों द्वारा किया गया राजनीतिक गंदला ड्रामा स्पेक्टेक्यूलर रहा। इन सभी एक्शन दृश्यों में से सबसे कम, धीरे और मीतभाषी बोलनेवाले हमारे प्रधानमंत्री लो-प्रोफाइल होने के बावजूद भी यह लडाई जीत गये। इस ड्रामे का अखबारों एवं न्यूज चैनल वालों को हो-हल्ला मचाकर नैतिकता का पाठ पढाने की कोई जरूरत नहीं है।
यह एक ऐसा ऑपरेशन था जिसमें जरा सी चूक भी भारी पड सकती थी। संसद में मंगलवार को जिस घूस कांड को लेकर देश-विदेश में चर्चा हुई उसके लिए भाजपा के नेताओं ने बडे जतन से तैयारी की थी। हर कदम फूंक-फूंक कर रखा गया। इस सारे ऑपरेशन की कमान सौंपी गई भाजपा महासचिव और वकील अरुण जेटली को।
दो बैग में पैसा तो सुबह ही अशोक अर्गल के निवास पर पहुंच गया था, लेकिन ऑपरेशन में चार, पांच घंटे कानूनी सलाह लेने और योजना बनाने में लग गए। सबसे अहम सवाल यह था कि इस पूरे मामले का गवाह कौन बनेगा? राय मशविरे के बाद पूरे अभियान की जिम्मेदारी अरुण जेटली को सौंपी गई। विशेष सत्र की तिथि तय होते ही सांसदों की सौदेबाजी के कयास लगाए जाने लगे थे। इसके लिए सबसे पहले उन सांसदों की सूची बनाई जिनकी परिसीमन में सीटें खत्म हो गई हैं या मर्ज कर दी गई है। उसमें भी उन पर ज्यादा ध्यान देने को कहा गया जो दागदार रहे।
इस क्रम में फग्गन सिंह कुलस्ते पर नजर गई। शुरुआत अरुणाचल के एक सांसद के एसएमएस से हुई, जिसमें ३५ करोड रुपये का संदेश था। इसके बाद अशोक अर्गल, फग्ग्न सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा कमजोर कडी में शामिल कर दिए गए। बातचीत में तीनों सांसदों ने होशियारी यह बरती कि इसकी सूचना पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी दे दी। चैनल को शामिल कर लिया गया। पूरे मामले को अंजाम देने से पहले गवाह भी तलाशा गया। चालक और रिपोर्टर को इसके लिए उपयुक्त माना गया। इसके बाद मंथन चला कि खुलासा कैसे किया जाए? स्पीकर को सूचना दी जाए या सीधे सदन में बैग रक्खे जाये।
स्पीकर को सूचना देने पर मुद्दा दबने की आशंका थी लिहाजा सदन में बैग रखना तय हुआ। सांसद एक ही गाडी से दो बैग लेकर चले। सांसदों की चेकिंग नहीं होती, इसीलिए वे बैग लेकर सीधे सदन में पहुंचने में कामयाब हो गए। इसके बाद जो कुछ हुआ पूरे देश ने देखा। भाजपा को यह आभास हो गया लगता था कि सरकर बच रही है। यही नहीं अपने सांसदों के पलटी मारने की भी सूचनाएं उसे मिल रही थीं। वह सरकार गिराने की हडबडी में भी नहीं थी, उसे तो सरकार को एक्सपोज करना था जिसमें वह कामयाब रही।
इससे पहले भी लोकसभा में कई बार विश्वास-अविश्वास मत हो चुके है और तत्कालीन सरकारें बचती-गिरती भी रही है, पर मत विभाजन के पहले ऐसा नजारा कभी देखने नहीं मिला। राजनीतिक परिदृश्य गंदला हो गया है लेकिन भारतीय लोकतंत्र में ऐसा वाकया पहली बार हुआ है। ऐसा तो उस जमाने में भी नहीं होता था, जब राजतंत्र था। मैं एक सिरफिरे की तरह पूछना चाहती हूं कि इस देश के लोग ऐसे क्यों हो गए? यह तो आजादी के बाद की राजनैतिक महागुलामी है। क्या यह सबसे बडा सच नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र की अस्मिता को पूरी शान से थामे खडी संसद को न जाने किसकी नजर लग गई। बस यही दिन देखना बाकी था। लोकतंत्र के इस पवित्र मंदिर को आतंकवादियों की गोलियों ने इतना आघात नहीं पहुंचाया था, जितना कि इसके खुद के नुमाइंदों ने पहुंचा दिया है। अब हमें इस देश के दुश्मनों को कोई मशक्कत करने की जरूरत नहीं लगती। कोई सीबीआई, पुलिस, जांच समिति या लोकसभा अध्यक्ष इसको रोक या बदल नहीं सकते। ये सब तो आम जनता से भी ज्यादा लाचार अवस्था में हैं।
इन नेताओं के कृत्यों से देश आहत हुआ है, लहूलुहान हुआ है। ये राजनेता सत्ता पर काबिज होने के लिए किसी भी तरीके का इस्तेमाल कर सकते है। इनके लिए देश, समाज या जनता के कोई मायने नहीं है।
लोकतंत्र की दुहाई देनेवालों, भारत का सिर दुनिया के सामने शर्म से झुकाने वालों, लोकतंत्र का चीरहरण करने वालों को अब जनता ही सजा दे सकती है। देश की गरिमा पर लांछन लगाने वालों को इस देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी। भारतीय लोकतंत्र का यह काला दिन हर भारतीय को सालों तक, सदियों तक याद रहेगा। इन कौरव सेना ने हर प्रकार की मर्यादाओं का उल्लंघन किया है। देश में लोकतंत्र की हत्या नहीं हुई, समूचे भारत की हत्या हुई है। अब तक के इतिहास में हमने एकता और अखंडता की बातें इस दुनिया को सीखाई थी। लेकिन?
इस पूरे ड्रामे में माया मैडम को उल्लू बनाया गया। बेचारी मैडम कितने अरमानों के साथ सज-धज कर दिल्ली पहुंची थी। परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा प्रवक्ता नकवी ने घोषणा कर दी कि, मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात कहां से आयी? वे कब से ऐसे ख्वाब देखने लगी। अब मायावती की समझ में आ गया है कि, आडवाणी और वामपंथी उनका सिर्फ इस्तेमाल कर रहे थे।
प्रकाश करात और वृंदा करात अब इस देश के पोलिटिक्स के लिए आऊट ऑफ डेइट है। मार्क्सवाद के किताबों में लिखे थियरी के मुताबिक भारत में राजनीति कर रहे यह दोनों चीन के इशारों पर नाचते है। लेकिन भारत की जनता को शायद उनका नाच पसंद नहीं आया।
बाहर वाला हमला करता है तो हम मरते हैं या मारते है। पर जब हमारे अपने घर की मर्यादा पर हमला बोलते है तो क्या करे? एक ओर मनमोहन सरकार जिन्होंने देश की भलाई के लिए अपनी सरकार तक को दांव पर लगा दिया तो दूसरी ओर भाजपा के नुमाइंदे जिनकी वजह से आज दुनिया के सामने हमारा सिर शर्म से झुक गया। ओ बीजेपीवालो ! कम से कम इस देश की मिट्टी की लाज रख ली होती। जो अपने स्वार्थ के लिए देश की गरिमा के साथ खिलवाड कर सकते है, क्या जनता उन पर विश्वास करेगी? हम तो दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते है, भारत को महाशक्ति के रूप में देखना चाहते है।
मायावती, वामपंथी और भाजपा ने मिलकर सरकार गिराने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। उन्हें तो ऐसा ही लग रहा था कि मनमोहन सरकार को विश्वास मत हांसिल करने में खूब पसीना बहाना पडेगा और अगर सरकार विश्वास मत हासिल कर भी लेगी तो ज्यादा से ज्यादा एक-दो या पांच वोट से जीतेगी लेकिन हुआ इसका उल्टा। और अब इनके दांतों तले ऊंगलियां दब गई है। लालुप्रसाद मंडली ने जो कहा था उसके मुताबिक सरकार के समर्थन मे २९० से ज्यादा वोट भले ना गिरे लेकिन २७५ का आंकडा भी गलत नहीं है। सबसे अहम तो यह है कि, सरकार के समर्थन में २७५ के सामने २६५ वोट मिले। और इस तरह कुल १९ मतो का अंतर है। मायावती, वामपंथी और भाजपा ने जो सोचा था उनके हिसाब से यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। जिन्होंने पूरी जिंदगी एक दूसरे पर कीचड उछालने के अलवा कुछ नहीं किया ऐसे लोग अपने सिद्धांतों की बलि चढाकर कांग्रेस सरकार को गिराने के एक मात्र उद्देश्य से ही मिले थे। कांग्रेस को हराने के अलावा इनके पास और कोई उद्देश्य भी नहीं था इसीलिए उन्हें सफलता नहीं मिली।
फीके-फीके मनमोहन सिंह ने पहली बार वामपंथियों के सामने ऐसा रवैया अपनाया कि, सरकार बचे या गिरे लेकिन अब भिडना है। और उसीका फल उन्हें मिला है।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलियो कोय
जो मन खोजा अपना मुज से बुरा ना कोय
ऐसा हाल भाजपा का हुआ है। जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वही उसमें गिरता है। भाजपा के बागी सांसद भाजपाईयों का विरोध झेल रहे है। बागियों के दफ्तर में जमकर तोडफोड हो रही है। उनके खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है। अब क्या फायदा? कटी हुई नाक वापस नहीं आ सकती। यह तो पंछी उडने के बाद पिंजरे को ताला लगाने जैसा काम है। इन आठ बागियों को अब शूली पर लटकाकर भी कोई फायदा नहीं है। इससे तो इनकी मूर्खता का प्रदर्शन होगा। भाजपा ने जिन आठ बागियों को सस्पेन्ड किया है उनमें दो गुजरात राज्य के सांसद है। एक सुरेन्द्रनगर के सोमाभाई गांडाभाई और दूसरे दाहोद के बाबुलाल कटारा। भाजपा ने इन्हें सस्पेन्ड किया लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह लोग भाजपा में थे? बाबु कटारा दूसरे की बीवी को अपनी बीवी बनाकर विदेश जा रहे थे तब पकडे गए थे उस समय भाजपा ने उन्हें निलंबित कर दिया था। सोमाभाई को नरेन्द्र मोदी के सामने आपत्ति होने के कारण विधानसभा चुनाव में खुल्लेआम भाजपा के सामने मोर्चा निकाला और भाजपा ने उन्हें भी रवाना कर दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि, भाजपा ने उन्हें पहले से ही अपने से अलग कर दिया था। इन्हें विश्वास मत के दौरान अपने मतलब के लिए इनकी याद आई! इन आठ सांसदो को निलंबित करते वक्त आडवाणी और राजनाथ सिंह ने नैतिकता की बडी बडी बाते की और देश में लोकतंत्र के मूल्यों का पतन और भ्रष्टाचार की दुहाई दी। आडवाणी और राजनाथ कुछ भी कहे लेकिन भ्रष्टाचार और नैतिकता की बाते क्या उन्हें शोभा देती है? बाबु कटारा कबूतर बाजी के अपराध में पकडे गए तो उन्हें भाजपा ने निकाल दिया और अब जरूरत पडने पर उनके सारे गुनाह माफ! क्या यह नैतिकता है? सोमाभाई ने भाजपा नेताओं को गालिया देने में कोई कसर नहीं छोडी और इस अपराध में उन्हें भी निलंबित किया गया था। विश्वास मत में इनकी जरूरत पडने पर भाजपा को सोमालाल की याद आ गई। क्यों, अब आपकी नैतिकता कहा गई? इसका जवाब है आपके पास। भाजपा ने जिन आठ बागियों को निलंबित किया है उनमें से एक ब्रिजभूषण सिंह शरण भी है। वे उ.प्र. के गोंडा के है और घाट-घाट के पानी पीकर आये है। भाजपा ने उन्हें भी एक बार निकाल दिया था इसकी वजह जानना चाहोगे? शरण साहब के घर में से दाउद इब्राहिम गेंग के गुंडे पकडे गए थे। जो इनसान दाउद इब्राहिम जैसे देशद्रोही के साथ मेल-जोल रखता है उसे भाजपा टिकट दे और बाद में नैतिकता की बाते करती है। राजनैतिज्ञ मानते होंगे कि लोगों की याददाश्त बहुत छोटी होती है लेकिन उनकी यह सोच गलत है।
अफसोस! किस्सा यही नहीं खत्म होगा। मन को कडा कर लीजिए। अभी कुछ नंगी वास्तविकताएं और देखनी है। सत्र की समप्ति के बाद वंदे मातरम की धुन शायद इसीलिए मन की तहों को ममत्व से भिगो नहीं सकीं। असली ड्रामा तो अब शुरू होनेवाला है।
जय हिंद

सोमवार, 21 जुलाई 2008

यहां सब कुछ बिकता है

परमाणु मुद्दे को लेकर यूपीए का सहयोगी दल वाम मोर्चा ने अपना समर्थन वापिस ले लिया है। वर्तमान केन्द्र सरकार संकट में आ गई है। २२ जुलाई के शक्ति परीक्षण में या तो सरकार रहेगी या जायेगी। इसको लेकर सारे देश में राजनैतिक अटकलों एवं अस्थिरता का दौर शुरु हो गया है। मनमोहन सिंह २२ जुलाई को लोकसभा में विश्वासमत प्राप्त करेंगे तब तक यह गर्माहट बरकरार रहेगी। २२ जुलाई के विश्वासमत का काउन्ट डाउन शुरु हो गया है, सत्ताधारी कांग्रेस एवं वामपंथियों ने एक-दूसरे को गिराने के लिए अपनी सारी ताकात काम पर लगा दी है। हमारे देश के वामपंथी मानते है कि अमरिका के साथ परमाणु करार भारत के हितों का विरोधी है। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि चीन तो ऐसा करार कर चुका है, तो उनका जवाब होता है कि चीन से हमें क्या लेना-देना। लेकिन जब चीन द्वारा पाकिस्तान को लगातार मजबूत बनाने, तिब्बतियों का विनाश करने या फिर उसके घटिया माल को भारतीय बाजार से निकालने का सवाल आता है, तो वे चुप हो जाते है, विरोध करते है या फिर बगले झांकने लगते है।
भारत के वामपंथियों का यह दोहरा मापदंड या स्वरूप नया नहीं है। असल में, वे नहीं चाहते कि भारत में एक स्थिर और मजबूत इरादों वाली सत्ता स्थायी हो, क्योंकि ऐसा होने से उनके इरादों पर पानी फिर जायेगा। कटु वास्तविकता यही है कि आज जिस स्थिति में देश घिरा है, उसमें केन्द्र में कमजोर सरकार होना अभिशाप साबित हो सकता है। वामपंथी मनमोहन सरकार को हर हाल में गिराना चाहते है, क्योंकि अमरिका के साथ परमाणु करार के मसले पर सरकार ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया है। लेकिन वास्तव में वे कभी भी यूपीए सरकार की स्थिर और सबल छवि बनने के पक्ष में नहीं थे। और उनके इस आचरण ने देश में राजनीतिक अस्थिरता के माहौल को बढावा देने में भरपूर सहयोग किया है। शक्तिविहीन सत्ता के कारण अतीत में जो कुछ हुआ है, उसकी पुनरावृति फिर न हो सके, इसके लिए हमें वामपंथियों के वर्तमान चाल-चरित्र और चेहरे को ठीक से देखना होगा। मनमोहन सिंह विश्वासमत के बाद अपनी सरकार टिका पायेंगे या नहीं यह तो २२ जुलाई को तय होगा लेकिन उससे पहले जो लीला हो रही है वह दिलचस्प भी है और आघातजनक भी। इस लीला में जो भी होगा उससे आमजन इनका असली रूप पहचान जायेंगे।
अमरिका के साथ परमाणु करार इस देश के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और मनमोहन सिंह विश्वासमत हांसिल करेंगे तो ही इस करार में आगे बढेंगे, वरना इस करार का `राम बोलो भाई राम' ही होने वाला है। और इस देश को मिलने वाले लाभ भी नहीं मिलेंगे। इन परिस्थितियों में इस देश के चुने गए प्रतिनिधि इस करार के समर्थन में है या नहीं इस विषय में चर्चा करने के बजाय ये लोग क्या कर रहे है? सौदेबाजियां और पुराने स्कोर सेटल। एक नजर हमारे चुने गए प्रतिनिधियों की गतिविधियों पर.......
पल पल में पाला बदलने के लिए मशहूर झामुमो के प्रमुख शिबू सोरन के लोकसभा में पांच सदस्य है। सोरन ने घोषणा की है कि, अगर कांग्रेस उन्हें केन्द्र में प्रधानपद देगी तो ही वे विश्वासमत के समर्थन में वोट देंगे, वरना उनके खिलाफ मतदान करेंगे। सोरन ने अपने दरवाजे सभी के लिए खोल रक्खे है। सोरेन बाजार में खडी वेश्या की तरह खुलेआम सौदेबाजी कर रहे है। इस देश को लाभ मिले या ना मिले उन्हें उसकी जरा सी भी चिंता नहीं है, लेकिन उन्हें फायदा होना ही चाहिए। यह महाशय खुद को निजी लाभ ना मिले तो इस देश को होनेवाला लाभ रुकवाने की धमकी बडी बेशर्मी से देते है। वामपंथी या भाजपा परमाणु करार का विरोध करते है तो उसके लिए कारण भी देते है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि सोरेन जैसे लोग यह करार देशहित में है या नहीं इस मामले में ही स्पष्ट नहीं है। ऐसे लोग अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते है, किसी भी हद तक गिर सकते है। इस देश को बेच भी सकते है।
आंध्रप्रदेश में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) नामक एक पार्टी है और लोकसभा में उसके तीन सदस्य है। टीआरएस की मांग है कि उन्हें आंध्र में एक अलग राज्य चाहिए और यह कांग्रेस से इसी मुद्दे पर अलग हुई है। इस पार्टी ने घोषणा की थी कि, अगर कांग्रेस उन्हें अलग तेलंगाना की रचना का आश्वासन देती है तो उन्हें उनकी ओर से समर्थन मिलेगा वरना वे कांग्रेस के खिलाफ मतदान करेंगे। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और वे अब वामपंथियों के पाले में जा बैठे है। उनके लिए परमाणु करार से ज्यादा महत्वपूर्ण बाबत अलग तेलंगाना राष्ट्र की रचना है। यह विभाजनवादी मानसिकता है। इसी मानसिकता की वजह से ही तो खालिस्तान आंदोलन की शुरुआत हुई थी और बाद में आतंकवाद। जिससे हम सभी अच्छी तरह से वाकिफ है। जिन लोगों को देशहित से ज्यादा चिंता अपने अलग राज्य की है ऐसे लोगों का क्या भरोसा ? इन दोहरे चरित्रवालों को कल चीन और पाकिस्तान अलग तेलंगाना राष्ट्र बनाने में मदद करने का भरोसा देंगे तो यह लोग उनके पाले में जा बैठेंगे। काश्मीर और पंजाब में यही तो हुआ है।
बिहार के पप्पु यादव सहित चार सांसद अभी जेल में है। २२ जुलाई को यह लोग लोकसभा में आकर मतदान कर सके ऐसी व्यवस्था की गई है। यह महानुभाव विश्वासमत के समर्थन में मतदान करेंगे या विरुद्ध में, लेकिन मुफ्त में नहीं करनेवाले ! यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि देश के लाभदायी बाबत के समर्थन के लिए हमें गुनहगारों का समर्थन लेना पड रहा है।
मायावती अभी तक कांग्रेस के साथ थी और मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के खिलाफ। मायावती परमाणु करार की तरफदारी करती थी और मुलायम सिंह यादव विरोध। राजनीति है ही ऐसी चीज... यहां जो सुबह आपका दोस्त है शाम को आपका दुश्मन बन जाये यह तय नहीं होता लेकिन रातोरात उनकी सोच भी बदल सकती है? और वो भी ऐसे मुद्दे पर जिस पर देश का भविष्य निर्भर है? यह सरासर अवसरवाद है और देश हित या विचारधारा से ज्यादा राजनैतिक लाभ महत्वपूर्ण होता है यह उसका सूबूत है।
लाल कृष्ण आडवाणी भाजपा के प्रधान पद के उम्मीदवार है और उन्होंने वामपंथियों के सामने कांग्रेस ने अपने घूटने टेक दिए थे उसे देखकर ‘लाल सलाम’ जैसा अदभूत शब्दप्रयोग किया था। अब कांग्रेस-मुलायम एक है तब उन्होंने नया शब्द दिया है ‘दलाल सलाम’। (यह दलाल शब्द अमरसिंह के लिए है) दिलचस्प बात तो यह है कि, मनमोहन सरकार को गिराने के लिए आज भाजपा-वामपंथी एक है और इस मामले में आडवाणी ने चुप्पी साधी है। क्यों जनाब! क्या अब भाजपा जो कर रही है वह ‘लाल सलाम’ नहीं है।
मुस्लिम धार्मिक नेता और संगठनों ने शायद ही पहली बार देशहित के किसी मुद्दे पर अपना मंतव्य दिया है और साफ शब्दों में कहा है कि, मुसलमान परमाणु करार के खिलाफ नहीं है। एक मुस्लिम सांसद ने अदभूत बात कही कि, कोई करार देशहित में हो या ना हो हिन्दू या मुस्लिम करार कैसे हो सकता है? और अमरिका के साथ परमाणु करार देशहित में है इसलिए हम उसके समर्थन में है। लोकसभा में कुल ५४३ सदस्य है जिनमें ३५ मुस्लिम है। इन ३५ में से कांग्रेस के १०, राजद के ३, सपा के ७ है और सभी करार के समर्थन में है। इस देश का भला सोचने के लिए हिन्दू होना जरुरी नहीं है। जो इससे साबित होता है। करार का विरोध करने में ज्यादातर हिन्दू सांसद है। इस करार से मुसलमान नाराज हो जायेंगे ऐसा कहनेवाले भी हिन्दू ही है। उनके लिए इस देश के फायदे से ज्यादा मुसलमान वोटबैंक महत्वपूर्ण है।
विडंबना देखिए, आम आदमी की खैरख्वाह पार्टियां लड रही है। लेकिन रोटी को उसकी पहुंच में बनाये रखने के लिए नहीं, एक करार।
इस खींचातान की लडाई में महज ३६ घंटे शेष बचे है। आज से मनमोहन सिंह विश्वासमत ले सके इस हेतु से बुलाई गई संसद के खास सत्र की शुरूआत होनेवाली है। भाजपा के तमाम मत सरकार विरोधी माने जाते है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। क्या भाजपा के सभी मत सरकार विरोधी होंगे ? अगर सोमनाथ चेटर्जी जैसे लोग पिछले ४० साल से पार्टी से जुडे होने के बावजूद बगावत पर उतर सकते है तो दूसरा कोई भी ऐसा अपनी पार्टी के साथ क्यों नहीं कर सकता ? भाजपा के साथियों में चार सांसद ऐसे है जो कांग्रेस के पक्ष में है। जो कि इसबार अपना पाला बदलने वाले है। अगर ऐसे सात-आठ बागी मिल जाये तो कांग्रेस का काम हो सकता है।
मायावती अभी बहुत उछल रही है लेकिन अब तक का इतिहास गवाह है। जब कभी इस प्रकार का राजनैतिक आपालकाल आया है तब तब माया मैडम की पार्टी में विभाजन हुआ है और यह इतिहास दोबारा दोहराया जायेगा तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सबसे ज्यादा खतरा फिलहाल मायावती की पार्टी पर ही है। इन सभी अटकलों पर कल विराम लग जायेगा। और कौन कितने में बिका यह तो नहीं पता चल सकता लेकिन, कौन बिका ये तो पता चलने ही वाला है। इसलिए निश्चिंत होकर होनेवाले इस तमाशे को देखना पडेगा।
जय हिंद