सोमवार, 21 जुलाई 2008

यहां सब कुछ बिकता है

परमाणु मुद्दे को लेकर यूपीए का सहयोगी दल वाम मोर्चा ने अपना समर्थन वापिस ले लिया है। वर्तमान केन्द्र सरकार संकट में आ गई है। २२ जुलाई के शक्ति परीक्षण में या तो सरकार रहेगी या जायेगी। इसको लेकर सारे देश में राजनैतिक अटकलों एवं अस्थिरता का दौर शुरु हो गया है। मनमोहन सिंह २२ जुलाई को लोकसभा में विश्वासमत प्राप्त करेंगे तब तक यह गर्माहट बरकरार रहेगी। २२ जुलाई के विश्वासमत का काउन्ट डाउन शुरु हो गया है, सत्ताधारी कांग्रेस एवं वामपंथियों ने एक-दूसरे को गिराने के लिए अपनी सारी ताकात काम पर लगा दी है। हमारे देश के वामपंथी मानते है कि अमरिका के साथ परमाणु करार भारत के हितों का विरोधी है। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि चीन तो ऐसा करार कर चुका है, तो उनका जवाब होता है कि चीन से हमें क्या लेना-देना। लेकिन जब चीन द्वारा पाकिस्तान को लगातार मजबूत बनाने, तिब्बतियों का विनाश करने या फिर उसके घटिया माल को भारतीय बाजार से निकालने का सवाल आता है, तो वे चुप हो जाते है, विरोध करते है या फिर बगले झांकने लगते है।
भारत के वामपंथियों का यह दोहरा मापदंड या स्वरूप नया नहीं है। असल में, वे नहीं चाहते कि भारत में एक स्थिर और मजबूत इरादों वाली सत्ता स्थायी हो, क्योंकि ऐसा होने से उनके इरादों पर पानी फिर जायेगा। कटु वास्तविकता यही है कि आज जिस स्थिति में देश घिरा है, उसमें केन्द्र में कमजोर सरकार होना अभिशाप साबित हो सकता है। वामपंथी मनमोहन सरकार को हर हाल में गिराना चाहते है, क्योंकि अमरिका के साथ परमाणु करार के मसले पर सरकार ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया है। लेकिन वास्तव में वे कभी भी यूपीए सरकार की स्थिर और सबल छवि बनने के पक्ष में नहीं थे। और उनके इस आचरण ने देश में राजनीतिक अस्थिरता के माहौल को बढावा देने में भरपूर सहयोग किया है। शक्तिविहीन सत्ता के कारण अतीत में जो कुछ हुआ है, उसकी पुनरावृति फिर न हो सके, इसके लिए हमें वामपंथियों के वर्तमान चाल-चरित्र और चेहरे को ठीक से देखना होगा। मनमोहन सिंह विश्वासमत के बाद अपनी सरकार टिका पायेंगे या नहीं यह तो २२ जुलाई को तय होगा लेकिन उससे पहले जो लीला हो रही है वह दिलचस्प भी है और आघातजनक भी। इस लीला में जो भी होगा उससे आमजन इनका असली रूप पहचान जायेंगे।
अमरिका के साथ परमाणु करार इस देश के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और मनमोहन सिंह विश्वासमत हांसिल करेंगे तो ही इस करार में आगे बढेंगे, वरना इस करार का `राम बोलो भाई राम' ही होने वाला है। और इस देश को मिलने वाले लाभ भी नहीं मिलेंगे। इन परिस्थितियों में इस देश के चुने गए प्रतिनिधि इस करार के समर्थन में है या नहीं इस विषय में चर्चा करने के बजाय ये लोग क्या कर रहे है? सौदेबाजियां और पुराने स्कोर सेटल। एक नजर हमारे चुने गए प्रतिनिधियों की गतिविधियों पर.......
पल पल में पाला बदलने के लिए मशहूर झामुमो के प्रमुख शिबू सोरन के लोकसभा में पांच सदस्य है। सोरन ने घोषणा की है कि, अगर कांग्रेस उन्हें केन्द्र में प्रधानपद देगी तो ही वे विश्वासमत के समर्थन में वोट देंगे, वरना उनके खिलाफ मतदान करेंगे। सोरन ने अपने दरवाजे सभी के लिए खोल रक्खे है। सोरेन बाजार में खडी वेश्या की तरह खुलेआम सौदेबाजी कर रहे है। इस देश को लाभ मिले या ना मिले उन्हें उसकी जरा सी भी चिंता नहीं है, लेकिन उन्हें फायदा होना ही चाहिए। यह महाशय खुद को निजी लाभ ना मिले तो इस देश को होनेवाला लाभ रुकवाने की धमकी बडी बेशर्मी से देते है। वामपंथी या भाजपा परमाणु करार का विरोध करते है तो उसके लिए कारण भी देते है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि सोरेन जैसे लोग यह करार देशहित में है या नहीं इस मामले में ही स्पष्ट नहीं है। ऐसे लोग अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते है, किसी भी हद तक गिर सकते है। इस देश को बेच भी सकते है।
आंध्रप्रदेश में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) नामक एक पार्टी है और लोकसभा में उसके तीन सदस्य है। टीआरएस की मांग है कि उन्हें आंध्र में एक अलग राज्य चाहिए और यह कांग्रेस से इसी मुद्दे पर अलग हुई है। इस पार्टी ने घोषणा की थी कि, अगर कांग्रेस उन्हें अलग तेलंगाना की रचना का आश्वासन देती है तो उन्हें उनकी ओर से समर्थन मिलेगा वरना वे कांग्रेस के खिलाफ मतदान करेंगे। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और वे अब वामपंथियों के पाले में जा बैठे है। उनके लिए परमाणु करार से ज्यादा महत्वपूर्ण बाबत अलग तेलंगाना राष्ट्र की रचना है। यह विभाजनवादी मानसिकता है। इसी मानसिकता की वजह से ही तो खालिस्तान आंदोलन की शुरुआत हुई थी और बाद में आतंकवाद। जिससे हम सभी अच्छी तरह से वाकिफ है। जिन लोगों को देशहित से ज्यादा चिंता अपने अलग राज्य की है ऐसे लोगों का क्या भरोसा ? इन दोहरे चरित्रवालों को कल चीन और पाकिस्तान अलग तेलंगाना राष्ट्र बनाने में मदद करने का भरोसा देंगे तो यह लोग उनके पाले में जा बैठेंगे। काश्मीर और पंजाब में यही तो हुआ है।
बिहार के पप्पु यादव सहित चार सांसद अभी जेल में है। २२ जुलाई को यह लोग लोकसभा में आकर मतदान कर सके ऐसी व्यवस्था की गई है। यह महानुभाव विश्वासमत के समर्थन में मतदान करेंगे या विरुद्ध में, लेकिन मुफ्त में नहीं करनेवाले ! यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि देश के लाभदायी बाबत के समर्थन के लिए हमें गुनहगारों का समर्थन लेना पड रहा है।
मायावती अभी तक कांग्रेस के साथ थी और मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के खिलाफ। मायावती परमाणु करार की तरफदारी करती थी और मुलायम सिंह यादव विरोध। राजनीति है ही ऐसी चीज... यहां जो सुबह आपका दोस्त है शाम को आपका दुश्मन बन जाये यह तय नहीं होता लेकिन रातोरात उनकी सोच भी बदल सकती है? और वो भी ऐसे मुद्दे पर जिस पर देश का भविष्य निर्भर है? यह सरासर अवसरवाद है और देश हित या विचारधारा से ज्यादा राजनैतिक लाभ महत्वपूर्ण होता है यह उसका सूबूत है।
लाल कृष्ण आडवाणी भाजपा के प्रधान पद के उम्मीदवार है और उन्होंने वामपंथियों के सामने कांग्रेस ने अपने घूटने टेक दिए थे उसे देखकर ‘लाल सलाम’ जैसा अदभूत शब्दप्रयोग किया था। अब कांग्रेस-मुलायम एक है तब उन्होंने नया शब्द दिया है ‘दलाल सलाम’। (यह दलाल शब्द अमरसिंह के लिए है) दिलचस्प बात तो यह है कि, मनमोहन सरकार को गिराने के लिए आज भाजपा-वामपंथी एक है और इस मामले में आडवाणी ने चुप्पी साधी है। क्यों जनाब! क्या अब भाजपा जो कर रही है वह ‘लाल सलाम’ नहीं है।
मुस्लिम धार्मिक नेता और संगठनों ने शायद ही पहली बार देशहित के किसी मुद्दे पर अपना मंतव्य दिया है और साफ शब्दों में कहा है कि, मुसलमान परमाणु करार के खिलाफ नहीं है। एक मुस्लिम सांसद ने अदभूत बात कही कि, कोई करार देशहित में हो या ना हो हिन्दू या मुस्लिम करार कैसे हो सकता है? और अमरिका के साथ परमाणु करार देशहित में है इसलिए हम उसके समर्थन में है। लोकसभा में कुल ५४३ सदस्य है जिनमें ३५ मुस्लिम है। इन ३५ में से कांग्रेस के १०, राजद के ३, सपा के ७ है और सभी करार के समर्थन में है। इस देश का भला सोचने के लिए हिन्दू होना जरुरी नहीं है। जो इससे साबित होता है। करार का विरोध करने में ज्यादातर हिन्दू सांसद है। इस करार से मुसलमान नाराज हो जायेंगे ऐसा कहनेवाले भी हिन्दू ही है। उनके लिए इस देश के फायदे से ज्यादा मुसलमान वोटबैंक महत्वपूर्ण है।
विडंबना देखिए, आम आदमी की खैरख्वाह पार्टियां लड रही है। लेकिन रोटी को उसकी पहुंच में बनाये रखने के लिए नहीं, एक करार।
इस खींचातान की लडाई में महज ३६ घंटे शेष बचे है। आज से मनमोहन सिंह विश्वासमत ले सके इस हेतु से बुलाई गई संसद के खास सत्र की शुरूआत होनेवाली है। भाजपा के तमाम मत सरकार विरोधी माने जाते है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। क्या भाजपा के सभी मत सरकार विरोधी होंगे ? अगर सोमनाथ चेटर्जी जैसे लोग पिछले ४० साल से पार्टी से जुडे होने के बावजूद बगावत पर उतर सकते है तो दूसरा कोई भी ऐसा अपनी पार्टी के साथ क्यों नहीं कर सकता ? भाजपा के साथियों में चार सांसद ऐसे है जो कांग्रेस के पक्ष में है। जो कि इसबार अपना पाला बदलने वाले है। अगर ऐसे सात-आठ बागी मिल जाये तो कांग्रेस का काम हो सकता है।
मायावती अभी बहुत उछल रही है लेकिन अब तक का इतिहास गवाह है। जब कभी इस प्रकार का राजनैतिक आपालकाल आया है तब तब माया मैडम की पार्टी में विभाजन हुआ है और यह इतिहास दोबारा दोहराया जायेगा तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सबसे ज्यादा खतरा फिलहाल मायावती की पार्टी पर ही है। इन सभी अटकलों पर कल विराम लग जायेगा। और कौन कितने में बिका यह तो नहीं पता चल सकता लेकिन, कौन बिका ये तो पता चलने ही वाला है। इसलिए निश्चिंत होकर होनेवाले इस तमाशे को देखना पडेगा।
जय हिंद

5 टिप्‍पणियां:

Nachiketa Desai ने कहा…

आपका राजनैतिक विश्लेषण पढा. अच्छा लिखती हैं आप. क्या आप ही चौपाल में भी लिखती हैं?

Wicked Me Says ने कहा…

Buddy, keep it short n sweet. Nice...I liked what you said.[:)]

Awasthi.S ने कहा…

Jee ati uttam....

tiku ने कहा…

Its a hidden truth....keep it up

विजययात्रा ने कहा…

जी आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया.....आगे भी आप मेरा हौसला बढाते रहे..... जय हिंद