गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

अपने वक्त के भारत का नेता

(शास्त्री जी के जन्म दिवस पर)

कद उनका अदना सा था लेकिन बडे मजबूत थे विचार
शास्त्री जी ने दिया था नारा `जय जवान जय किसान'

क्या यही जवान और किसान हमारे राष्ट्र का निर्माण करेंगे ?
जो कि पेट और प्राणों से जुझ रहे है..... लड रहे है

आज उस जवान और किसान की कहानी
आप सभी भारतीयों को है सुनानी

आज का जवान और किसान किस तरह जीता है
जीता भी है या मर-मर कर जीता है

किसान जो कि भारत मां का बेटा कहा जाता है
पूरे दिन खून-पसीना बहाने के बाद भी

अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी तक नहीं जुटा पाता
क्या उस किसान से हमारे राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा ?

कुछ बादल ने साथ नहीं दिया, साहुकारों के कर्ज में डुबा सो अलग
इसलिए इन सारी समस्याओं का हल वो आत्महत्या कर सुलझाता है

अब किसान की बीवी जो अपने बच्चों का भूख नहीं देख सकती
और अपने तकदीर को कोसती चल पडती है किसी कुंए की ओर

फिर किसान की जवान होती बेटी पर हर निगाह लगी थी
वह किसी अंधेरे कोने में अपने आपको छुपाना चाहती है

लेकिन,
वहां भी उसे ढूंढ लिया उन खूंखार भेडियों ने
और यह सारा मंजर देखता है किसान का जवान होता बेटा

इतना सब कुछ होने के बावजूद उसमें लडने की खुमारी है,
वर्तमान की न्याय व्यवस्था पर वह आंखें टिकाये खडा है

वो सोचता है कि उसे कभी तो न्याय मिलेगा
लेकिन उसका सोचना शून्य था.......

फिर वो चल पडता है उन हैवानों की बस्ती की ओर
अपनों को खोने का दर्द और जा मिलता है उस गुट से

जो उसे अवाम के नाम पर गुमराह करता है
और आतंकवादी के रुप में उसका नया जन्म होता है

क्या उस जवान से हमारे राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा ?

भारत में सिर्फ डार्विन का सिध्धांत ही चल पाया है
शक्तिशाली ही यहां दो वक्त की रोटी खा सकता है

इसलिए .....
जय जवान जय किसान नहीं
जय फायदेवाला धर्म और बाकी सब राष्ट्रीय शर्म बोलिए
जय हिंद

1 टिप्पणी:

संजीव तिवारी ने कहा…

बहुत ही उम्‍दा व स्‍तरीय शव्‍द क्षमता है आपकी इसे निरंतर रखें । आभार ...

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनांयें