मंगलवार, 7 जुलाई 2009

प्रणब दा का गांव, गरीब व मध्यमवर्ग को उपहार

समग्र देश जिसका बेसब्री से इंतजार कर था वह आम बजट आखिर पेश हो गया। केन्द्र में मनमोहन सिंह सरकार की वापसी के बाद यह पहला बजट था। लोग ऐसी उम्मीदे पालें बैठे थे कि उन्होंने यूपीए को झोली भर-भरकर वोट दिए और फिर से केन्द्र में सत्ता दिलाई उसका अहसान प्रणब दा थोडी बहुत राहतें देकर जरुर चुकायेंगे लेकिन यह उम्मीद नाकाम साबित हुई है। हालांकि इंसाफ की खातिर कहें तो प्रणब दा ने लोगों को एकदम हलाल भी नहीं किया है और राहतें दी है लेकिन इसके बावजूद लोग निराश है क्योंकि यह राहतें लोगों की उम्मीदों के मुताबिक नहीं है।
लोग और खासतौर पर नौकरी-पेशा वर्ग प्रणब दा से आयकर में जोरदार राहतों की उम्मीदें पाले बैठा था और उनका ऐसा मानना था कि आयकर की छूट सीमा बढकर दो लाख के करीब हो जायेगी। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में आयकर की छूट सीमा बढाकर तीन लाख रुपये करने का विश्वास दिलाया था और बावजूद इसके इससे बिना ललचाये हमने कांग्रेस को वोट दिया इसलिए नौकरी-पेशा वर्ग का ऐसा मानना था कि कांग्रेस तीन गुना नहीं तो दो लाख तक की आयकर की छूट सीमा कर देगी लेकिन प्रणब दा उन्हें धोखा दे गए। प्रणब दा ने आयकर की छूट सीमा बढाई लेकिन बमुश्किल से १० हजार। इससे नौकरी-पेशा वर्ग को साल में बमुश्किल एकाद हजार का मुनाफा होगा। एक हजार रुपये में अब कुछ नहीं मिलता है तब इन राहतों से नौकरी-पेशा वर्ग निराश है। ऐसी ही हालत कॉर्पोरेट जगत की है। कॉर्पोरेट जगत मंदी का शोर मचाता था और मंदी के नाम से राहतें मांगता था लेकिन प्रणब दा ने उन्हें ठेंगा दिखाया है और कॉर्पोरेट टेक्स के दरों में कोई फेरबदल नहीं किए है। फ्रिन्ज बेनिफिट टेक्स हटाया तो है लेकिन उसका फायदा कॉर्पोरेट कंपनियों को ज्यादा नहीं होनेवाला इसलिए कॉर्पोरेट जगत निराश है। शेयर बाजार इस बार बहुत बडे पैकेज की उम्मीद पालें बैठा था और प्रणब दा ने कोमोडिटी ट्रान्जेक्शन टेक्स को दूर कर कोमोडिटी बाजार को खुश कर दिया और शेयर बाजार को लटका दिया जिसका उन्हें झटका लगा है। शेयर बाजारों में सोमवार को इसी के चलते ऐतिहासिक गिरावट आई। यह फेहरिस्त बहुत लंबी है और सभी की बात करना यहां मुमकिन नहीं लेकिन थोडे में कहें तो लोगों ने जो बडी-बडी अपेक्षाएं रखी थी उस तरह का बजट प्रणब दा ने पेश नहीं किया। हालांकि इसमें गलती लोगों की है, प्रणब दा की नहीं। यूपीए सरकार की सत्ता में वापसी के बाद का यह पहला बजट है और अभी सरकार को कोई जरुरत नहीं कि वह वोटबैंक को ध्यान में रख बजट पेश करे। लोकसभा चुनाव में अभी पांच साल की देर है और ऐसे किसी राज्यों में चुनाव भी नहीं आ रहे कि उसके कारण सरकार को कोई नाराज ना हो जाये इसकी ऐतियात बरतनी पडे। प्रणब दा ने जो बजट पेश किया है वह वास्तव में तो यूपीए सरकार को लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को आगे बढाने की कोंग्रेस की रणनीति का एक हिस्सा मात्र है और उन्होंने उसी वर्ग को खुश रखने का प्रयास किया है जिस वर्ग ने उन्हें फिर से सत्ता में आने में मदद की है। प्रणब दा के इस बजट में गांव के लोगों की सुख-सुविधाएं बढे इसके लिए दोनों हाथों से पूंजी का आवंटन किया गया है और इसी तरह किसानों को भी जहां तक हो सके खुश रखने का प्रयास किया गया है। प्रणब दा ने गांवों में पक्की सडक योजना से लेकर ग्रामीण रोजगार योजना के लिए आवंटन में हाथ खुले रखे है और कोई कसर ना रह जाये इसका खयाल रखा है। इसी तरह किसानों पर भी प्रणब दा मन लगाकर बरसे है।
यूपीए की सफलता में सबसे बडा हाथ किसानों के लिए कर्ज माफी योजना का था और उ.प्र जैसे राज्यों में तो इस योजना के दम पर कांग्रेस फिर से खडी हो पाई है। इस बजट में यह योजना और ६ साल के लिए बढाई गई है। इसके अलावा जो किसान जल्दी लोन भरे उन्हें ब्याज में एक प्रतिशत माफी और तीन लाख रुपये तक के लोन पर मात्र सात प्रतिशत ब्याज जैसे कदम उठाए गए है। ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर्स को मजबूत बनाने के लिए जो कदम उठाए गए है उसका फायदा भी अंत में किसानों को ही मिलनेवाला है जिसे देख किसानों के लिए दोनों हाथों में लड्डू है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि प्रणब दा के बजट के सामने कॉर्पोरेट जगत चाहे रोये या नौकरी-पेशा वर्ग सिर फोडे या शेयर बाजार हाहाकार मचाये लेकिन यह बजट इस देश में बदल रहे समीकरण का संकेत है। भारत में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरु हुआ उसके बाद ऐसा माहौल हो गया था कि अर्थतंत्र यानि शेयर बाजार और मल्टिनेशनल कंपनियां ही सब कुछ है। आर्थिक उदारीकरण के नाम से कॉर्पोरेट क्षेत्र और कंपनियों को राहतें दी जाए तो बजट अच्छा, नहीं दी जाए तो बजट खराब, जैसा माहौल पैदा हो गया था। टीवी चैनलों में बैठे एनालिस्ट और शहरों में रहते पत्रकार इसी गज से बजट को मापते और इसी के आधार पर बजट अच्छा है या बुरा यह तय करते थे। प्रणब दा ने इस परंपरा को तोडने का प्रयास किया है और इसके लिए उन्हें मेरा सलाम। इस देश में ७० प्रतिशत लोग गांवों में बसते है और इस देश के अर्थतंत्र की रीढ ही खेती है तब उसकी उपेक्षा कर भला आप कैसे चल सकते है? इससे इंकार नहीं कि उद्योग किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण है और निवेश भी महत्वपूर्ण है लेकिन उन्हें खेरात करो और खेती की या खेती पर टिकनेवाले गांवों के लोगों की उपेक्षा करो यह ठीक नहीं।
पिछले डेढ-दो दशक के दौरान यही खेल चला और सभी राजनीतिक पार्टियां उदारीकरण की रोशनी से भरमाकर शेयर बाजार और नौकरीपेशा वर्ग को खुश करने के लिए बजट पेश करती गई। इस गलती की किमत तमाम राजनीतिक पार्टियों ने चुकाई और उससे भी ज्यादा इस देश ने चुकाई। इस देश में जो राजनीतिक अस्थिरता पिछले डेढ-दो दशक के दौरान देखने को मिली उसके मूल में यही गिनती थी। भाजपा ने उसके छह साल के शासन में अच्छे काम नहीं किए ऐसा भी नहीं है। इस देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में इन छह सालों में बहुत काम हुए। एक्सप्रेस वे इसका श्रेष्ठ उदाहरण है और बावजूद इसके भाजपा फिर से सत्ता में क्यों नहीं आई? क्योंकि वह इन्डिया शाइनिंग की बातें कर उन्हीं लोगों को प्रभावित करने के प्रयास करती रही जिनके पास आवाज तो है लेकिन इस देश की बागडोर किसके हाथ में सौंपनी है इसकी चाबी नहीं। यह चाबी तो गांवों में रहते करोडों भारतीयों के हाथों में है और भाजपा उन्हें ही भूला बैठी।
कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार की रचना हुई उसके बाद से शुरुआत में तो कांग्रेस ने भी यही गलती की थी लेकिन बाद में कांग्रेस के कुछेक समझदार लोगों को मालूम हुआ कि ऐसा ही चलता रहा तो भाजपा की तरह हमारा भी काम तमाम हो जायेगा और उन्होंने गांवों को ध्यान में रखकर खेल जमा दिया। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से लेकर किसानों के कर्ज माफी तक के कार्यक्रमों को अमल में रखा गया और उसका फल कांग्रेस को मिला।
इस बजट से प्रणब दा ने एक संदेश दिया है और अहसास कराया है कि यह बजट सिर्फ शेयर बाजार या नौकरी-पेशा या कंपनियों के लिए नहीं है।
जय हिंद

2 टिप्‍पणियां:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

सटीक विश्लेषण.. आभार

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

बहुत सकारात्मक अरे , यह जो बजट विश्लेष |
धन्य कलम है आपकी , फले बढे यह देश ||