शुक्रवार, 15 मई 2009

किंगमेकर और अफवाएं

चुनावी नतीजा आने में अब 24 घंटे से भी कम समय बचा है। अफवाएं और अटकलों का बाजार तेजी पकडा हुआ है। इन सभी अफवाएं और अटकलों के मूल में टीवी चैनलों ने किए एक्जिट पॉल है और टीवी चैनलें भी अपना एक्जिट पॉल एकदम विश्वसनीय है ऐसा साबित करने के लिए जैसा ठीक लगे डींग हांक रही है। एक्जिट पॉल के मुताबिक इस चुनाव में तीसरे मोरचे को 100 से भी ज्यादा बैठकें मिलेगी और केन्द्र में किसकी सरकार बनेगी यह तीसरे मोरचे के दल तय करेंगे। टीवी चैनलें तीसरे मोरचे में वामपंथी, चंद्राबाबु नायडू, जयललिता आदि को गिनते है।
इसमें से आधे तो भाजपा या कांग्रेस में से किस ओर लुढकेंगे इसकी फिराक में लग गए है और किसके पास से ज्यादा फायदा मिल सकता है उसके कयास में जुटे हुए है हालांकि यह सब सभी राजनीतिक दलें करती ही है इसलिए उसके सामने आपत्ति नहीं जताई जा सकती और यहां तक तो बात ठीक है लेकिन इसके बाद जो नोंक-झोंक चल रही है उसके मुताबिक शरद पवार प्रधानमंत्री पद की रेस में सबसे आगे है।
टीवी चैनलों के मुताबिक शरद पवार ने तीसरे मोरचे के दलों से साथ समझौता करना भी शुरु कर दिया है और प्रधानमंत्री पद पर खुद की ताजपोशी हो इसके लिए सब कुछ पक्का करने में लगे है। टीवी चैनलों के मुताबिक चौथे मोरचे में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती, जयललिता, चंद्राबाबु नायडू, नवीन पटनायक, वामपंथी आदि शरद पवार की पालखी उठाकर उनका राज्याभिषेक करने को तैयार ही है। शरद पवार पुराने राजनीतिज्ञ है और इस कारण ही वे प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बैठ जायेंगे ऐसा तुक्का जिसके दिमाग में आया होगा उस पर मुझे दया आ रही है। उसके साथ जो कोई इस बात को सच मानकर सूर में सूर मिला रहे है उनके बुद्धि की भी जांच की आवश्यकता है।
शरद पवार प्रधानमंत्री पद पर बैठेंगे ऐसी बाते करनेवाले को पवार की राजनीतिक ताकत को जानना चाहिए। पवार बरसों से राजनीति में है और ताकत की राजनीति के चैम्पियन रहे है इसलिए सतत मीडिया में छाये रहते है लेकिन हकीकत यह है कि उनकी औकात एक राज्यकक्षा के नेता से ज्यादा कुछ भी नहीं। पवार ने अभी तक केन्द्र में या महाराष्ट्र में जो कोई सत्ता पद भोगा वो कांग्रेस की मेहरबानी थी। उन्होंने 1998 में सोनिया गांधी के विदेशी कुल के मामले कांग्रेस पार्टी छोडी और अपना नया दल बनाया उस बात को आज 13 साल हुए और इन 13 सालों में पवार अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी भी नहीं बना सके। महाराष्ट्र पवार की कर्मभूमि है और उनका गढ माना जाता है लेकिन पवार में अपनी ताकत पर अपने ही राज्य में अपनी पार्टी को सत्ता दिलाने की ताकत भी नहीं है। पवार की एनसीपी को कांग्रेस के तलवे चाटने पडते है तभी तो उसे महाराष्ट्र में सत्ता मिली है। खुद पवार जिस सोनिया गांधी का विरोध कर अलग हुए वही सोनिया गांधी के आधार पर वापिस खडे हुए है।
2004 के लोकसभा चुनाव में शरद पवार की पार्टी को 9 सीटें मिली थी और उस समय उसमें एक-दो सीट की बढोतरी हो तो भी उनका आंकडा 12 या ज्यादा से ज्यादा 15 पर पहुंचे और पवार कितने ही बडे नेता क्यो ना हो लेकिन लोकसभा में सिर्फ 15 बैठक हासिल कर प्रधानमंत्री पद पर बैठने की बात में कोई दम ही नहीं है।
चैनलवाले जिस तीसरे और चौथे मोरचे की बात कर रहे है उसमें ही मुलायम सिंह यादव, लालूप्रसाद यादव, मायावती, जयललिता, चंद्राबाबु नायडू और प्रकाश करात आदि प्रधानमंत्री पद पर बैठने के लिए कतार में खडे ही है और वे लोग बारह से पंद्रह बैठक हासिल करनेवाले शरद पवार की पालखी उठाकर घूमे यह बात कुछ हजम नहीं हुई।
दूसरी बात यह कि तीसरे मोरचे में ही मायावती, जयललिता आदि ऐसा मानने वाले है कि मेरा नहीं तो किसी का नहीं और खुद के अलावा कोई और कुर्सी पर बैठे उसमें उन्हें जरा भी दिलचस्पी नहीं इसलिए वे लोग भाजपा या कांग्रेस की सरकार बनने देंगे लेकिन पवार या प्रकाश करात जैसे किसी को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बैठने नहीं देंगे। क्या मालूम कोई चमत्कार हो जायें, वैसे पवार प्रधानमंत्री बने ऐसे कोई संजोग नहीं है।
जय हिंद

1 टिप्पणी:

बी एस पाबला ने कहा…

देखें ऊँट किस करवट बैठता है