गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

ममता और माया : राजनीतिक नौटंकी

मायावती वर्सिस सोनिया और रायबरेली की रणभूमि
केन्द्रीय रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव ने 2008-09 के रेल बजट में सोनिया गांधी के संसदीय मतक्षेत्र रायबरेली में रेलवे के डिब्बे बनाने के प्रोजेक्ट की घोषणा की थी। इस प्रोजेक्ट को सोनिया गांधी का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ माना जाता है क्योंकि इस प्रोजेक्ट के तहत रायबरेली में 10 हजार लोगों को नौकरी मिलने वाली है। इस प्रोजेक्ट में रेल मंत्रालय रु. 1000 करोड का निवेश करेगा और 2010 में उत्पादन शुरु होगा। प्रथम वर्ष 1200 डिब्बे और उसके बाद हर साल 1500 डिब्बों का निर्माण इस प्लान्ट में होगा। इस प्रोजेक्ट के लिए मायावती सरकार ने ही 400 एकड जमीन का आवंटन भी रेल मंत्रालय को कर दिया था और ग्रामसभा ने इस जमीन का कब्जा भी रेल मंत्रालय को सौंप दिया था। 14 अक्तूबर को इस प्लान्ट का शिलान्यास होनेवाला था और उसके चार दिन पहले यानि कि 10 अक्तूबर को रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट संतोष कुमार श्रीवास्तव ने घोषणा की कि राज्य सरकार ने यह जमीन रेल मंत्रालय को सौंप दी थी लेकिन इस जमीन पर कोई प्रोजेक्ट शुरु न होने के कारण किसानों में असंतोष था और वे अपनी जमीन वापस चाहते है इसलिए राज्य सरकार ने इस जमीन आवंटन को रद्द करने का निर्णय लिया है। 11 अक्तूबर को मायावती ने रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट के रिपोर्ट के आधार पर रेल मंत्रालय को जमीन आवंटन रद्द करने की घोषणा की और उसके कारण सोनिया एवं लालू जिसमें उपस्थित रहने वाले थे उस शिलान्यास को स्थगित रखना पडा। रेल मंत्रालय ने मायावती सरकार के निर्णय को सुप्रीमकोर्ट में ललकारा है और सुप्रीमकोर्ट ने जमीन आवंटन रद्द करने के निर्णय के सामने स्टे दिया है। अब 17 अक्तूबर को सुनवाई होगी। रेल मंत्रालय ने राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय आए तो रायबरेली में ही रेलवे की जमीन पर इस फैक्ट्री को शुरु करने की घोषणा कर दी है इसे देखते हुए इसमें दो राय नहीं कि यह प्रोजेक्ट रायबरेली में ही शुरु होगा।
हम जब दुनिया के दूसरे देशों की ओर देखें और उन देशों के विकास की ओर नजर डालें तब अफसोस होगा कि जिनके पास कोई स्त्रोत नहीं है, कोई ताकत नहीं है, मेनपावर नहीं है ऐसे देश आज समृद्ध है। हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम कंगाल जैसी स्थिति में जीने को मजबूर है। यह सवाल बार-बार जेहन में उठता है और इसका सिर्फ एक ही जवाब है हमारी सियासत और राजनेता। हमारा देश पिछडेपन और कंगाल अवस्था में जीने को क्यों मजबूर है? हम सबसे पिछडे क्यों है? क्योंकि हमारे देश में शासनकर्ताओं की एक ऐसी जमात मौजूद है और उनके रहते हमारा देश कभी विकास की बुलंदी को नहीं छु सकता। इन नेताओं ने अपने निजी स्वार्थ के कारण इस देश के विकास में अडचन डाल दी है।
रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री को दी गई जमीन का आवंटन रद्द होना तथा कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को सार्वजनिक रैली को संबोधित करने से रोकने के लिए धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश इन दोनों के कारण उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी सरकार की अक्ल पर तरस आती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उस 400 एकड जमीन के मामले पर यथास्थिति बनाये रखने के आदेश दिए हैं जिसका आवंटन मायावती सरकार ने इस तर्क के साथ रद्द कर दिया कि वहां के किसान रेल कोच के लिए जमीन देने को तैयार नहीं है। चूंकि भारत सरकार एवं अन्य तथा रायबरेली के किसानों की ओर दाखिल याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने यथास्थिति कायम रखने का अंतरिम आदेश दे दिया अत: बाजी हाथ से जाने की आशंका के चलते मायावती सरकार ने धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिये। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को शिकस्त देने में चालाकी, चालबाजी और चतुराई की अपनी भूमिका होती है। यहां समझ में आ रहा है कि ऐसे क्षुद्र टोटकों को आजमाकर मायावती अपनी ही फजीहत लेंगी।
राजनीति में मायावती का अपना धाकड अंदाज है। इसी के चलते वह कई बार तानाशाह जैसी भूमिका में दिखाई देती है। दूसरी बात सत्ता की गर्मी उनके सिर पर कितनी ही बार इस हद तक चढी देखी गई कि राजनीति में न्यूनतम संकोच और मर्यादा का पालन तक होते नहीं दिखा।
राजनीतिक जीवन और पद दोनों के मामले में किसी को अमर नहीं कहा जा सकता। वास्तव में कोच फैक्ट्री के भूमि आवंटन को रद्द किये जाने से भारतीय राजनीति में नये संक्रमण के संकेत मिलते हैं। प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल को श्रेय से वंचित करने के लिए अडंगा डालने की राजनीति की जो शुरुआत पश्चिम बंगाल में सिंगूर में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने की उसे रायबरेली में मायावती ने आगे बढाया है। साणन्द (गुजरात) में कांग्रेस के प्रवक्ता अर्जुन मोढवाडिया भी इस रास्ते पर चलने की सोच रहे हैं। कुल मिलाकर महसूस होने लगा है कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है। जहां तक मायावती की बात है, तो वह सत्ता की दादागिरी के चक्कर में कांग्रेस को ही पैर जमाने का मौका दे बैठी है।
कुछ समय पूर्व बंगाल में ममता बनर्जी ने ऐसी ही भावना का प्रदर्शन कर रतन टाटा को बंगाल से भगाया था और अब मेडम माया की बारी है। ममता की लडाई गलत नहीं थी लेकिन उनका स्वार्थ गलत था। मायावती ने अभी जिस तरह रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री के प्रोजेक्ट में अडचन पैदा की है यह उनकी तुच्छ मानसिकता को प्रदर्शित करता है। ममता के किस्से में तो यह विरोध पार्टी में है और उन्हें राजनीतिक तौर पर फिर से खडे होने के लिए एक नौटंकी की जरुरत थी इसलिए उन्होंने यह खेल खेला लेकिन मायावती के किस्से में तो यह मजबूरी भी नहीं है। मायावती उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री है और उनके राज्य में एक बडा प्रोजेक्ट आए, इससे 10 हजार लोगों को नौकरी मिलेगी, तब तो उन्हें इस प्रोजेक्ट के कारण खुश होना चाहिए और इस प्रोजेक्ट का स्वागत करना चाहिए लेकिन मेडम इस प्रोजेक्ट का सत्यानाश करने पर तुली है।
आज जब बडी कंपनियां अपने राज्य में प्रोजेक्ट लेकर आए तो इसके लिए मुख्यमंत्री उद्योगपतियों से अपील करते है लेकिन माया मेडम राजनीतिक हिसाब करने में लगी है यह देखकर दु:ख होता है। जिस देश में ऐसे राजनेता हो वह देश कभी अमरिका या जापान या जर्मनी को छोडो लेकिन चीन या कोरिया की बरोबरी भी नहीं कर सकता। राज्य का जो होना है हो और लोगों को नौकरी मिले या ना मिले लेकिन उनका स्वार्थ पूरा होना चाहिए। अगर हमारा शासनकर्ता ऐसा मानता है तो ऐसा नेता देश का विकास करवा सकेंगे?
रायबरेली के प्रोजेक्ट के मामले सबसे आघातजनक बात तो यह है कि उन्होंने जिस जमीन के आवंटन को रद्द किया यह जमीन उन्होंने ही रेल मंत्रालय को दिया था। उस वक्त मायावती और कांग्रेस के बीच हनीमुन चल रहा था इसलिए मायावती कांग्रेस पर फिदा थी और मेडम सोनिया की हर बात में हां में हां मिलाने को अपना सौभाग्य समझती थी। रायबरेली सोनिया गांधी का मतक्षेत्र है इसलिए उन्होंने झुमते हुए यह जमीन आवंटित किया था। उसके बाद अब तक जैसा होता रहा है वैसा कांग्रेस के साथ भी मायावती का अनबन हुआ इसलिए वे कांग्रेस को दबोचने का मौका ढूंढती रहती है। कांग्रेस ने मुलायम के साथ हाथ मिलाया इसलिए माया मेडम ज्यादा क्रोधित हो गई है और कांग्रेस का पत्ता साफ करने का एक भी मौका गवाना नहीं चाहती। कांग्रेस और मायावती कुश्ती करे या हनीमुन मनाए इससे लोगों को कोई लेना-देना नहीं है लेकिन इसके कारण विकास पर जो असर हो रहा है यह बिल्कुल नहीं चलेगा।
मायावती को इन सब से कोई लेना-देना नहीं है। मायावती भारतीय राजनीति में एक अजीब केरेक्टर है और उनमें दिमाग या तमीज नाम की कोई चीज नहीं है। इनका जिनके साथ अनबन हो जाए उनका सत्यानाश करने में वे किसी भी हद तक जा सकती है। अमरसिंह से लेकर अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी से लेकर आडवानी तक सभी को इन्होंने अपना कातिल अंदाज दिखा दिया है। मेडम जिनके सामने विरोध जताती है उनकी गरज पडे उन्हें गले लगाने में भी इन्हें कोई झिझक महसूस नहीं होती। एक जमाने में मायावती और भाजपा साथ-साथ थे तब मायावती लालजी टंडन को अपना भाई कहती और आडवानी को पिता समान गिनती थी। भाजपा के साथ अनबन होने बाद मेडम भाजपा के नेताओं के कान से कीडे रैंगे ऐसी गालियां देती है। मायावती के लिए यह बहुत ही मामूली बात है। कल को अगर जरुरत पडे तो यह आडवानी को बाप बनाकर पांव पड सकती है और राजनाथ को भाई बनाकर राखी भी बांध सकती है। हमें इससे कोई ऐतराज नहीं है। आडवानी या राजनाथ को ऐतराज ना हो तो हम भला कौन होते है? यूं तो रायबरेली में रेल प्रोजेक्ट स्थापित नहीं हो तो भी हमें कोई ऐतराज नहीं और उसका हमें कोई फर्क नहीं पडता लेकिन हम कहां माया या ममता जैसी मानसिकता वाले है। हम तो पूरे देश को एक मानकर सोचते है इसलिए दु:खी होना पडता है।
माया-ममता या अन्य इनके जैसे लोग एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते है। ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों से इनका स्वार्थ पूरा होता होगा और दो-चार दिन का नशा चढता होगा लेकिन इससे समाज को और आम आदमी को कोई लाभ नहीं मिलता है। अगर किसी शासक को ज्यादा लंबे समय तक टिकना है तो इन सब मुद्दों को एक ओर रख लोगों के लिए सोचने की आदत डालनी चाहिए, विकास को महत्व देना चाहिए। लोग विकास को याद रखेंगे। आपके स्वार्थभरे विजय को नहीं। धन्य है हमारे देश के यह नेता! ऐसे नेता हो तो हमारा देश आगे कैसे आयेगा?
जय हिंद

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

यह बडे ताज्जुब की बात है...


हमारे देश में मुस्लिम वोट बैंक के लिए राजनेता किसी भी हद तक गिर सकते है और ऐसी राजनीति ओर किसी देश में देखने नहीं मिलेगी। मुस्लिम मतों के लिए हमारे राजनेता जिस तरह मुसलमानों को खुश करने के प्रयास करते है ऐसा तो मुस्लिम देशों में भी नहीं होता होगा। और इसका ताजा उदाहरण समाजवादी पार्टी के नेता अमरसिंह ने दिल्ली में एन्काउन्टर में मारे गये दो आतंकवादियों के मौत के मामले शुरु की कोशिश है।
कौन है यह अमरसिंह ? चलिए, सबसे पहले जानते हैं अमरसिंह के बारे में।
अमरसिंह की करम कुंडली कुछ इस प्रकार है...
27 जनवरी 1956 के दिन उ.प्र. के अलीगढ में पैदा हुए अमरसिंह की परवरिश और पढाई कोलकाता में हुई। मध्यमवर्गीय राजपूत खानदान के अमरसिंह ने हिन्दी मीडियम में पढाई की और सेन्ट जेवीयर्स में से ग्रेजुएट हुए। कोलकाता में अपनी राजनैतिक करियर की शुरुआत करनेवाले अमरसिंह मूल कांग्रेसी है और बुराबझार जिला कांग्रेस समिति के मंत्री के रूप में इन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। अमरसिंह आज अरबोपतियों में से एक है और इसकी शुरुआत भी वे कांग्रेस में थे तब से हुई थी। कोलकाता में 1980 में उनकी मुलाकात कांग्रेसी नेता वीरबहादुर सिंह के साथ हुई और अमरसिंह ने इसका जमकर लाभ उठाया। 1985 में वीर बहादुर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने उसके बाद नये उद्यमियों को सिर्फ एक प्रतिशत ब्याज पर राशि देनेवाली राशि संस्थाओं के साथ समझौते का काम सौंपा और मौके का फायदा अमरसिंह ने अपने बिजनेस को जमाने में किया। 1988 में वीरबहादुर बिदा हुए तब तक अमरसिंह करोडपति बन चुके थे। कांग्रेस में थे तब उनकी मुलाकात माधवराव सिंधिया से हुई। माधवराव 1990 में क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख पद से चुनाव लडे थे और उनके प्रतिद्वंदी जगमोहन दालमिया थे। उस वक्त अमरसिंह ने माधवराव को समर्थन दिया और माधवराव एक मत से जीत गये थे। इस अहेसान का बदला माधवराव ने उन्हें ओल इन्डिया कांग्रेस कमिटी में शामिल करवाकर चुकाया। 1990 में मुलायम सिंह यादव का उदय हुआ उसके साथ ही अमरसिंह ने उनके साथ अपने संबंधो को मजबूत बनाना शुरु किया और मुलायम ने जब नई पार्टी की रचना की तब वे मुलायम के साथ जुड गये। तब से अमरसिंह मुलायम के साथ ही है। अमरसिंह का व्यक्तित्व विवादास्पद है और वे सतत विवाद खडा करते रहते है। गुजरात के जमाई अमरसिंह का बॉलीवुड में जोरदार संपर्क है और बच्चन खानदान एवं अनिल अंबानी परिवार के साथ उनकी मित्रता चर्चास्पद है।
दिल्ली में आतंकवादियों ने सिरियल बम ब्लास्ट किये उसके बाद दिल्ली पुलिस जामियानगर में आतंकवादियों की खोज में गई थी और वहां आतंकवादियों ने पुलिस पर गोलीबारी शुरु कर दी और उसमें दो आतंकवादी मारे गए। मोहनचंद शर्मा नामक पुलिस के एक इन्स्पेक्टर भी शहीद हो गये। दूसरे दो आतंकवादी पकडे गये और अभी वे दोनों दिल्ली पुलिस की हिरासत में है। यह कहने की जरुरत नहीं कि, दिल्ली में मारे गए दो आतंकवादी और पकडे गये दोनों आतंकवादी मुस्लिम थे।
दिल्ली में जो एन्काउन्टर हुआ वो नकली था ऐसा हंगामा दंभी सांप्रदायिकों की जमात ने उसी दिन से शुरु कर दी थी। हमारे यहां कुछेक टीवी चैनल वाले भी इस जमात के दलाल के रूप में कार्य करते है और उन चैनलों ने कही से दो-चार लोगों को पकड कर कैमेरे के सामने खडा कर दिया और इन लोगों ने कह दिया कि एन्काउन्टर नकली था। चैनलों को ऐसा ही चाहिए था और उन्होंने राई का पहाड बना दिया। और इस हंगामे का लाभ उठा जामिया मिलिया के वाइस चान्सलर ने घोषणा कर दी कि जो दो आतंकवादी पकडे गये है उनके कानूनी सहाय का तमाम खर्च युनिवर्सिटी उठायेगी।
इस देश में राजनेताओं की एक ऐसी भी जमात है जो ऐसे मौके के इंतजार में पलक पांवडे बिछाये बैठी होती है। ऐसा कुछ हो तब इनके मुंह में मुस्लिम मतबैंक का शहद टपकने लगता है। टीवी चैनलों ने शुरु किया इसलिए यह राजनेता भी कूद पडे। मायावती इसमें सबसे आगे थी। मायावती मुस्लिम वोटों के लिए कुछ भी कर सकती है और इसलिए वे इसमें शामिल हो यह समझा जा सकता है लेकिन उनके पीछे-पीछे कुछेक कांग्रेसी भी इसमें शामिल हो गये। दिग्विजयसिंह, अर्जुनसिंह इत्यादि इस जमात के बेजोड नमूने है और उन्होंने यह झंडा उठा लिया। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है और दिल्ली में कानून-व्यवस्था बरकरार रखने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है इसके बावजूद यह कांग्रेसी अपना ड्रामा कर रहे है जो आघातजनक है।
मुलायम और अमरसिंह मुस्लिम वोटबैंक के राजनीतिक चैम्पियन है लेकिन फिलहाल उनकी पार्टी केन्द्र में कांग्रेस को समर्थन दे रही है इसलिए यह लोग खुलकर बाहर नहीं आते थे और अबु असीम आजमी जैसे टट्टुओं को आगे कर बाजी खेलते थे लेकिन कांग्रेसियों को खुलेआम उनकी सरकार के खिलाफ बोलते देखने के बाद कांग्रेस को अहेसास हुआ कि हम शर्म में रह गये और दूसरा इसका फायदा उठा गया। उन्होंने सोचा कि अभी बाजी हाथ से नहीं गई है ऐसा समझकर अभी बाकी रही कसर पूरी करना चाहते हो इस तरह लडाई शुरु कर दी। और इस लडाई के जुनून में अमरसिंह अपना विवेक भी भूल गये और एकदम गद्दारी की हद पर उतर आये है।
अमरसिंह ने जामियानगर के एन्काउन्टर को तो नकली कहा है उसके साथ मोहनचंद शर्मा की शहादत पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। पुलिस नकली एन्काउन्टर कर सकती है लेकिन क्या कोई पुलिसवाला ऐसे नकली एन्काउन्टर में अपनी जान दे सकता है ? और यह सवाल असली या नकली एन्काउन्टर का नहीं है लेकिन हमारे राजनेता कितनी हद तक गिर सकते है उसका सुबूत है। अमरसिंह की पार्टी इस देश की सरकार को समर्थन देती है और ऐसे लोग ही ऐसी बातें करते है यह बडे अफसोस की बात है। अमरसिंह को तो सामने मुस्लिम वोटबैंक दिख रही है इसलिए उन्हें वे क्या कह रहे है उसकी जरा सी भी परवाह नहीं है लेकिन जो लोग अपनी जान की बाजी लगाकर इस देश के लिए लड रहे है उन पर क्या बीत रही होगी इसका विचार करना चाहिए। अमरसिंह की बयानबाजी सुनने के बाद कौन पुलिसवाला आतंकवाद के खिलाफ लडने के लिए तैयार होगा ? आप अपने दो-पांच प्रतिशत मुस्लिम वोटबैंक के लिए एक जांबाज के शहादत की कीमत कोडी की कर दो तो इस देश के लिए लडने हेतु कौन आगे आयेगा। अमरसिंह के बयान पर इस देश में बैठे लोगों ने चुप्पी साधी है यह देख कर मुझे बहुत दु:ख हो रहा है। अमरसिंह ने तो इस मामले केन्द्र में से अपना समर्थन वापिस लेने की धमकी भी दे दी है। कांग्रेस के सत्यदेव चर्तुवेदी जैसे इके-दुके नेता अमरसिंह के इस ड्रामे पर बोले तो अमरसिंह ने बडी बदतमीजी के साथ चिरकूट जैसे विशेषणों का इस्तेमाल कर उनका अपमान किया इसके बाद भी कांग्रेसी दिग्गज चुप्पी साधे है। वास्तव में कांग्रेस को अपनी गर्जना सुनानी चाहिए और अमरसिंह को साफ शब्दों में कह देना चाहिए कि वे अपनी जुबान को लगाम दे और यह समर्थन वापिस लेने की धमकी बंद करे। दिल्ली में जामियानगर में जो हुआ वह नकली एन्काउन्टर नहीं था और इसकी नैतिक जिम्मेदारी कांग्रेस की है। कांग्रेस को इसकी जिम्मेदारी ले खुलेआम बाहर आना चाहिए और अमरसिंह को उसकी औकात बता देनी चाहिए। कांग्रेस को अमरसिंह जैसे लोगों को उसकी हेसियत का अहसास तो कराना ही चाहिए लेकिन इससे पहले जो लोग कांग्रेस में होने के बावजूद सरकार के साथ खडे रहने की जिनकी ताकत नहीं है उन्हें भगा देना चाहिए। जबकि कांग्रेस में यह नैतिक हिम्मत होती तो आज यह दिन देखना नहीं पडता। यह घटना कांग्रेस के लिए एक सबक है। आलम यह है कि गुजरात में हुए आतंकवादियों के एन्काउन्टर के मामले हंगामा मचाने वाली कांग्रेस को अभी अमरसिंह मंडली उनकी ही दवा का डोज उन्हें पीला रही है और कांग्रेस को यह एन्काउन्टर नकली नहीं था ऐसा कह अपना बचाव करना पड रहा है। इसे हम क्या कहें?

जय हिंद

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008

अपने वक्त के भारत का नेता

(शास्त्री जी के जन्म दिवस पर)

कद उनका अदना सा था लेकिन बडे मजबूत थे विचार
शास्त्री जी ने दिया था नारा `जय जवान जय किसान'

क्या यही जवान और किसान हमारे राष्ट्र का निर्माण करेंगे ?
जो कि पेट और प्राणों से जुझ रहे है..... लड रहे है

आज उस जवान और किसान की कहानी
आप सभी भारतीयों को है सुनानी

आज का जवान और किसान किस तरह जीता है
जीता भी है या मर-मर कर जीता है

किसान जो कि भारत मां का बेटा कहा जाता है
पूरे दिन खून-पसीना बहाने के बाद भी

अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी तक नहीं जुटा पाता
क्या उस किसान से हमारे राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा ?

कुछ बादल ने साथ नहीं दिया, साहुकारों के कर्ज में डुबा सो अलग
इसलिए इन सारी समस्याओं का हल वो आत्महत्या कर सुलझाता है

अब किसान की बीवी जो अपने बच्चों का भूख नहीं देख सकती
और अपने तकदीर को कोसती चल पडती है किसी कुंए की ओर

फिर किसान की जवान होती बेटी पर हर निगाह लगी थी
वह किसी अंधेरे कोने में अपने आपको छुपाना चाहती है

लेकिन,
वहां भी उसे ढूंढ लिया उन खूंखार भेडियों ने
और यह सारा मंजर देखता है किसान का जवान होता बेटा

इतना सब कुछ होने के बावजूद उसमें लडने की खुमारी है,
वर्तमान की न्याय व्यवस्था पर वह आंखें टिकाये खडा है

वो सोचता है कि उसे कभी तो न्याय मिलेगा
लेकिन उसका सोचना शून्य था.......

फिर वो चल पडता है उन हैवानों की बस्ती की ओर
अपनों को खोने का दर्द और जा मिलता है उस गुट से

जो उसे अवाम के नाम पर गुमराह करता है
और आतंकवादी के रुप में उसका नया जन्म होता है

क्या उस जवान से हमारे राष्ट्र का निर्माण हो पायेगा ?

भारत में सिर्फ डार्विन का सिध्धांत ही चल पाया है
शक्तिशाली ही यहां दो वक्त की रोटी खा सकता है

इसलिए .....
जय जवान जय किसान नहीं
जय फायदेवाला धर्म और बाकी सब राष्ट्रीय शर्म बोलिए
जय हिंद

एक पैगाम बापू के नाम

(गांधी जी के जन्म दिवस पर)

आज 2 अक्तूबर है बापू
आपका जन्म दिन है आज

हे मानव संस्कृति के मूर्तिमान,
भारत आत्मा के मंत्राकार !

आज राज्य के कार्यालयों में साल भर से धूल फांकती
आपकी प्रतिमा को साफ किया जायेगा...

आज नेता, अफसर लंबे-लंबे भाषण देंगे आपके विचारों पर
लेकिन अमल कोई नहीं करेगा...

आपकी प्रतिमा पर माला चढाई जायेगी
और आदर्शो की स्तुति गाई जायेगी...

भारत बहुत बदल चुका है..... बापू !

हां ! यहां विकास तो बहुत हुआ है
लेकिन आम आदमी का नहीं, संस्कृति-सभ्यता का नहीं

यहां सच पल-पल मरता है,
झूठ का बोलबाला है..... बापू !

ईमानदारी को छलनी किया जाता है,
समझदारी को बेवकूफी समझी जाती है

बेईमानी से सारे देश का कारोबार चलता है,
भला परिश्रम कौन करना चाहेगा?

भारतीय अब चाह कर भी तपस्या नहीं कर सकता है
और ना ही अपने अधिकारों के लिए लड सकता है

क्योंकि,

उसे अपने अधिकार मांगने पर असंख्य समस्याओं से घेरा जाता है
मजबूर कर सत्य से कोसों दूर उठाकर फेंक दिया जाता है..... बापू !

जो इंसाफ की गुहार लगाता है उसे केवल धक्कों के कुछ नहीं मिलता
और झूठ के बलबूते पर खोटा सिक्का चलता रहता है

लंबी जिरह और तारीखों के बीच उसके पैर के जूते घिस जाते है
आजादी के 61 साल बाद भी भारतीय गुलामी में जी रहा है

इंसाफ मांगने वाला दम तोड देता है और फिर,
उसकी फाइल हमेशा के लिए बंद हो जाती है

तो वह गुलाम हुआ कि नहीं?
भारत की आत्मा मर चूकी है..... बापू !

भारत तो उसी दिन मर चुका था जिस दिन आपकी हत्या हुई थी
उस मरे हुए भारत का आपको प्रणाम है..... बापू !

उसे राह दिखाने वाला, सोचने की ताकत देने वाला अब कोई गांधी नहीं रहा
अब तो केवल वोटों की चोटों पर आप केवल नोटों पर ही दिखते हो

आज के युवा आपके विचार और आदर्श पर हंसते है
अहिंसा, धर्म और सत्याग्रह जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं रहा

आपके देश में आपको ही ब्लेक मेल किया जाता है
सिसकियों और चीत्कारों से आकाश भरा पडा है

बेगुनाह जिंदगियां बेवक्त कफन ओढने को मजबूर हुई है
हाय! दहशतगर्द बेखौफ है, भारत की तकदीर फूट गई है

हम मनुष्य नहीं, नागरिक नहीं, कठपूतलियां है
हम ताकतवरों और षडयंत्रकारियों की राजनीतिक संपत्ति हैं

उफ ! `सोने की चिडिया' कहा जाने वाले भारत का चेहरा धुंआ-धुंआ
चीख-पुकार और आर्तनाद! और सोती रहेंगी सरकार ?

सत्याग्रह को आधार बना अहिंसा के मार्ग पर चलकर
आपने ब्रिटिश सरकार को घर भगाया था

लेकिन आज विषधारी नागों की टोली से,
हमें मुक्त कौन करवायेगा? ..... बापू !

बापू ! इन घर के भेदियों ने चिंता बढा दी है
आपके आदर्श और विचारों की पल-पल हत्या होती है

बडे-बडे समाजवादी अपने विचार प्रस्तुत करते तो है
लेकिन चलता कोई नहीं,..... बापू !

क्योंकि वे जानते है यह मार्ग बडा ही कठिन है
सिर्फ प्रवचनों में ही अच्छा लगता है

उन नेताओं के मुख से आपका नाम सुनना भी
मुझे आपका अपमान सा लगता है,..... बापू !

आज सत्य की धुरी पर समय का रथ डगमगा रहा है
सत्ता की लडाइयों में आजादी का अर्थ कहीं खो गया है

क्या इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं?
इन राजतंत्र के खंडहर में भारत स्वतंत्रता की सांस कब लेगा?

शांति-अमन की कामना अब व्यर्थ है
क्योंकि, आतंक के छाये में हम जीने के आदि हो चुके है

आज मेरे पैगाम से आपको आघात पहुंचा है ना..... बापू !
इन अधूरी मंजिलों को कौन मोल लेगा

आज आपके जन्म दिन पर मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है
सिवा कि इन भीगी पलकों से मैंने अपने भग्न हिय का भार उतारा है

इसलिए..... बापू !
ये दो-चार आंसू ही मेरी ओर से भेंट है आपके लिए

हिंद को एक बनाने के लिए आपने अपनी पूरी जिंदगी बिता दी थी ना
लेकिन आज इसी हिंद को टुकडों में बांटने के लिए पूरी अवाम आगे आयी है

वो भी अपने-अपने धर्मों का झंडा हाथ में लिए
अपने-अपने खुदा और भगवान की इबादत और प्रार्थना के बाद

अब कुछ नहीं बचा है..... बापू !
भारत का समाजवादी लोकतंत्र का सपना खो गया है कहीं.....
जय हिंद

बुधवार, 17 सितंबर 2008

बिना नाक वाले पाटिल


गलियां जहां विरान और मोहल्ला है सुनसान
जिन्दा इंसानों की बस्तियां बन गई शमशान

कहीं आंख में नमीं थी, कहीं अश्क बही थी
हूकुमत के आगे आज आम इंसान परेशान

शैतानी बस्तियों से आया था कोई हैवान
भारत की रानी हो गई फिर से लहूलुहान

भोर में ना कोई शंख बजा ना शाम को आजान
लहू बहा जिन धर्मों का रंग था उनका एक समान

देश ने हाल के वर्षों में सिलसिलेवार बम धमाके झेले हैं। जयपुर, बंगलुरु, अहमदाबाद और अब दिल्ली। आतंकवादी हमलों के मद्देनजर सरकार की ओर से कोई मुक्कमल तैयारी नहीं दिख रही जो लगातार हो रहे धमाकों से पता चलता है। पांच दिन बीतने के बावजूद अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। सियासत कमान्डो के बीच सुरक्षित है, आम आदमी के जान की किसी को कोई परवाह नहीं है। मैं पूछती हूं कि क्या आम आदमी का लहू इतना सस्ता है? अभी जो तमाशा हो रहा है और जांच का नाटक खेला जा रहा है कुछ दिन बाद सब भुला दिया जायेगा। और इस आंतरिक सुरक्षा की नाकामी को देखते हुए पाटिल पर निशाना लाजिमी है। जिसे सरकार ने गंभीरता से लिया। बम ब्लास्ट गंभीर समस्या है। ऐसे गंभीर मसले पर चर्चा में पाटिल को शामिल नहीं किया गया। यही नहीं, उस बैठक में कई मंत्रियों ने उनकी कार्यशैली पर नाखुशी जताई। इससे पहले भी लालू यादव उनकी शिकायत सोनिया गांधी से कर चुके हैं। आतंकवाद के प्रति इस सुस्त नजरिये का संप्रग को अगले चुनाव में खामियाजा भुगतना पड सकता है। लिहाजा सत्ता के गलियारे में पाटिल की विदाई के कयास लगाए जा रहे हैं। इससे बडा अपमान क्या हो सकता है ! इनकी जगह कोई ओर होता तो कब का इस्तीफा दे चुका होता। लेकिन बिना नाक वाले पाटिल को कोई फर्क नहीं पडता। इन्हें तो चुल्लु भर पानी में डूब मरना चाहिए। इन्हें मान-अपमान की जरा सी भी परवाह नहीं है। कांग्रेस अगर वास्तव में पाटिल को गृहमंत्री पद से हटाना चाहती है तो यह इस देश पर बहुत बडा उपकार होगा।
शिवराज पाटिल एक असफल गृहमंत्री है। 2004 में इनके गृहमंत्री बनने के बाद ही देश में सबसे अधिक आतंकवादी हमले हुए है। 2004 से लेकर अब तक 12 जितने आतंकवादी हमले हुए है जबकि छोटे आतंकवादी हमलों की तो कोई गिनती ही नहीं हो सकती। शिवराज पाटिल के कार्यकाल से आतंकवाद देश के कोने-कोने में पहुंच गया। उनके कार्यकाल के दौरान हुए बडे हमलों पर गौर करें तो पता चलता है कि देश का एक भी बडा शहर आतंकवादी हमले से अछूता नहीं रहा। पाटिल मंत्रालय की सबसे बडी असफलता यह है कि सुरक्षा एजेंसी पूरी तरह विफल गई और एक भी हमले की इन सुरक्षा एजेंसियों को कानो-कान खबर नहीं हुई। इससे भी बडी असफलता तो यह है कि, अब तक उन जिम्मेदार लोगों को ढूंढने में वे सफल नहीं हो पाये। संसद पर 2001 में हुए हमले के केस में जिसे फांसी की सजा हुई है उस अफजल गुरु को फांसी देने में जो विलंब हो रहा है उसका जिम्मेदार भी पाटिल मंत्रालय ही है। डॉ. कलाम ने अफजल के फांसी की फाइल को 2003 में ही गृह मंत्रालय को भेज दिया था लेकिन उस फाइल को दबा दिया गया है जिसके जिम्मेदार पाटिल ही है।
सवाल केवल उनकी अकर्मण्यता का नहीं है। उनके ड्रेस सेंस का जो विवरण है वह बेहद चौंकाने वाला है। शनिवार को विस्फोट से पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में वह गुलाबी सूट में थे, विस्फोट के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए काले सूट में, और रात में घायलों को देखने जाते समय झक सफेद सूट में। नफासत बुरी चीज नहीं है, लेकिन त्रासवादियों के बीच यह आपकी संवेदनहीनता का भी सूचक है। जिस पर गृह सचिव यह कहकर जले में नमक छिडक रहे हैं कि हर हमले के बाद अनुभव बढता है। क्या आतंकवाद कोई प्रयोगशाला है, जिसमें हर हमले से सरकार सीख रही हैं? अपनी छवि की खास परवाह करने वाले गृहमंत्री अगर आतंकवाद को निर्मूल करने के बारे में भी सोचते, तो आज उनकी इतनी किरकिरी नहीं हो रही होती। अपने लिबास की उन्हें जितनी चिंता है, देश की सुरक्षा व्यवस्था की उतनी क्यों नहीं? यह हमारी सुरक्षा क्या खाक करेंगे। जिसकी किमत जनता अपनी जान गंवाकर चुका रही है।
पाटिल की असफलताओं का ग्राफ बहुत बडा है लेकिन दिल्ली ब्लास्ट के बाद वे सबके आंख में किरकिरी बन गए है। कांग्रेस में ही उन्हें हटाने के लिए माहौल बना हुआ है जिसके चलते यह फैसला जल्द से जल्द हो जाना चाहिए और इन्हें घर रवाना कर देना चाहिए। ऐसे गृहमंत्री की देश को कोई जरूरत नहीं है।
हमारे देश का गृहमंत्री कैसा होना चाहिए? जिसमें एक आग हो। जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता हो। पाटिल जैसा गृहमंत्री बिलकुल नहीं चलेगा। फीके-फीके मनमोहन सिंह को कडा रवैया अपनाना चाहिए। ऐसे गृहमंत्री को लात मार कर भगा देना चाहिए।
इस देश की राजनीति के आगे मेरी बौनी सी कलम कुछ भी नहीं है, लेकिन ये तो वक्त ही बतलायेगा कि किसकी चोट ज्यादा है और किसकी कम है। ये राजनेताओं के छिपे खेल तो दब जायेंगे लेकिन मेरी कलम में अंगारों से भरी स्याही कभी नहीं सुखेगी।
देश के सियासत में ऊंचे तख्त पर भेडिये ही भेडिये बिराजमान है। बात पगडी और टोपी की है। मेरी बोली कडवी जरुर है लेकिन यह समय की जरूरत है। राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रद्रोह की जंग जारी है। ये तो वक्त ही बतलायेगा कि किसको विजय मिलेगी।
न दोष किसी के देखो, न पोल किसी का खोलो...
स्वतंत्र के देश के नौजवानों, गांधी जी की जय बोलो...

जय हिंद

सोमवार, 8 सितंबर 2008

बिहार बाढ राहत पर राजनीति

आप सब सोच रहे होंगे कि, क्या बाढ पर राजनीति हो सकती है? जी हां, बिलकुल हो सकती है। हमारे देश का उसूल है, यहां सभी प्रकार की समस्याओं पर राजनीति की रोटी सेंकी जाती है। तो फिर हमारे माननीय नेतागण भला इस बाढ को कैसे छोड देते।
हम सब पिछले 21 दिन से पानी में डूबे गांव, खेत, रास्ते, घर और खाने पर टूटकर पडते अवश लोगों के समूह और पानी में खोए अपनों को तलाशती लगभग भरी हुई हजारों जोडी आंखों को लगातार देख रहे है। बिहार में हर बार बाढ आता है लेकिन इस बार की बाढ को राजनेता कैटरिना और सुनामी जैसा खतरनाक बता रहे है। हर बार की बाढ जीवन को सालों पीछे धकेल देती है।
वर्ष 1945 में कोसी योजना के तहत कोसी पर नेपाल से लेकर बिहार में गंगा के संगम तक दोनों किनारों पर 10 किलोमीटर लंबे तटबंध का प्रस्ताव बना था। पर यह तब तक फायदेमंद नहीं हो सकता था, जब तक नेपाल के बाराह इलाके में बांध नहीं बनाया जाता। तत्कालीन वायसराय लार्ड वेवल ने टेनेंसी वैली परियोजना की तर्ज पर काम शुरु करवाया, पर वह काम बिना कारण बताए बंद कर दिया गया। तब से आज तक बिहार की नदियों पर बने 3,454 किलोमीटर लंबे तटबंध टूटकर या लोगों द्वारा काटने से विनाश की कहानियां रच रहे हैं। हर साल यहां का 76 फीसदी इलाका बाढ में डूब जाता है, जो देश की कुल बाढ प्रभावित आबादी का 56 फीसदी है। इस समय अकेले उत्तर बिहार में 2,952 किलोमीटर लंबे तटबंध हैं, जिनके निर्माण में खरबों रुपये लगे हैं। लेकिन ये बाढ से बचाव के बजाय बाढ की विभीषिका के पर्याय बने हुए हैं। कोसी नदी के आसपास के लगभग 10 जिलों के 387 गांव इस बाढ की भेंट चढ चुके है।
वर्ष 1956 में नेपाल सरकार द्वारा भारत की सरहद पर विराट बांध बांधकर कोसी नदी के पानी को रोकने की कोशिश की गई थी। नेतागण का मानना था कि बांध बांधने से बाढ का पानी ज्यादा नहीं आ पायेगा। लेकिन अब उनकी समझ में आ जाना चाहिए कि इस तबाही का कारण ही बांध है। कोसी नदी ने भारत-नेपाल सीमा पर बने कुशहा बांध को तोड दिया और 200 वर्ष पुराने रास्ते पर फिर से बह चली। इस नदी को बिहार का शोक कहते है लेकिन कोसी किनारे के लोग इससे पूरी तरह सहमत नहीं। वे नदी और बाढ के साथ जीना सीख गए थे, पर विकासवादियों ने बाढ सहजीविता की उनकी कला ही नष्ट कर दी। नदी किनारे बसने वाला यह पानीदार समाज अब असहाय है। बाढ के साथ जीने वाले बांधों में कैद नदी की विभीषिका का अनुमान नहीं लगा पा रहे। वे असहाय बना दिए गए हैं। आज तैरने वाला समाज डूब रहा है।
तटबंधों की लंबाई, चौडाई और मोटाई से बाढ नहीं रुकती। बाढ अतिथि नहीं है, इसके आने की तिथियां बिलकुल तय है। लेकिन हमने विकास की पीठ पर सवारी करते-करते इस चेतावनी पर ध्यान ही नहीं दिया। पक्षों की बात को बाजु में रख शासक और तंत्र को सोचना चाहिए कि असली प्रगति और विकास किसे कहेंगे? अब जो बचा है उसे ही आगे बढाये यही काफी है। यह भी सही है कि रातोरात महल नहीं बन सकता। कछुए की तरह विकास होगा तो भी यह हमारे लिए कम नहीं।
बाढ से करीब 40 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित है। करीब 20 लाख लोग गायब भी बताए जा रहे है। ढाई लाख एकड कृषि भूमि का नुकसान हुआ है। राहत कैंपों की हालत खराब है। लोग वहां पत्ते खाकर किसी तरह जिंदा है। जहरीले जानवरों का डर अलग से है। उन्हें तत्काल भोजन, सिर छिपाने की जगह, दवा, पानी, कपडे, टेन्ट, चारपाई, केरोसिन, टॉर्च, दियासलाई आदि चाहिए। लोगों की आजीविका के मुख्य साधन पालतू और दूध देनेवाले पशु बाढ में बह गए है। गांव तो गांव छोटे-छोटे नगरों का कोई पता नहीं। बिहार में लगभग हरेक वर्ष खेती की दस लाख हेक्टेयर जमीन बाढ के पानी में तबाह होती है। करीब 2.5 करोड आबादी प्रत्येक वर्ष यह त्रासदी झेलती है। बडे पैमाने पर लोगों के विस्थापित होने, गर्म जलवायु और साफ-सफाई के अभाव सहित अन्य कारणों के चलते जलजनित रोगों के फैलने का खतरा बना हुआ है।
प्रधानमंत्री के हवाई दौरे ने एक अरब की सहायता राशि देकर इस बाढ को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। सरकारी कर्मकांड की लगभग सभी मुख्य रस्में पूरी कर दी गई। गले तक बाढ के पानी में डूबे लोग बेबस-बेकस हैं, लेकिन वे किसी भ्रम में नहीं हैं। उन्हें मालूम है कि सरकारी सहायता, राहत कार्य, राष्ट्रीय आपदा घोषणा आदि का मतलब क्या होता है। सभी जानते है। वर्ष 2002 में बाढ प्रभावित दरभंगा जिले के 18 प्रखंडों में सरकारी राहत महज 5.49 प्रतिशत लोगों तक ही पहुंच पाया था। इस बार एक अरब रुपये की सहायता और राष्ट्रीय आपदा का दरजा मिलने के बाद देखना है कि वहां राहत और बचाव कार्य कितना हो पाता है। राहत की घोषणा तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी की है। पर बिहार का सरकारी और गैर सरकारी तंत्र इस सहायता का लाभ प्रभावितों तक सचमुच पहुंचा पाएगा, इसका भरोसा बिहार के लोगों भी नहीं है। बिहार का आपदा प्रबंधन विभाग खुद ही लकवाग्रस्त है। वहां की सरकार भी खास कुशल नहीं रही। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें और स्वैच्छिक संस्थाएं काम पर लग गई है। लेकिन सवाल यह है कि 40 लाख से ज्यादा बाढ प्रभावित रहेंगे कहां? खाने-पीने के अलावा उनके बैठने-उठने की जगह भी ढूंढनी पडेगी। बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद उन्हें खाने-पीने की सामग्री तो मिल रही है, लेकिन ऐसी जगह ये लाखों लोग एक साथ कैसे रह सकते है? वहां प्रभावित लोगों को पलायन होने से रोकना सबसे बडा पुण्य होगा। क्योंकि, इससे दूसरे राज्यों में हालात बेकाबू हो सकते हैं। इसलिए किसी एक को नहीं, एक अरब लोगों को मिलकर मदद करनी चाहिए।
अब मुख्य विषय पर आते है कि इस बाढ से राजनीति का क्या लेना-देना। इसे भारत का दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि, देश में जब कभी कुदरती या मानवसर्जित आपदा आती है तब देश के माननीय नेतागण को राजनैतिक खिचडी पकाने का मौका मिल जाता है। एक-दूसरे पर कीचड उछालना... झूठ बोलना... इनकी रोजमर्रा की आदत में शुमार है। सभी पक्ष-प्रतिपक्ष एक दूसरे को बढ-चढ कर आगे लाने में जुट जाते है। अभी इस बात का मुख्य विषय से कोई लेना-देना नहीं लेकिन सिर्फ इतना ही कहूंगी कि ये लोग तो पराये देश में भी हमारे देश को नीचा दिखाने में पीछे नहीं हटते। सभी इस प्रलंयकारी बाढ प्रभावितों की राहत में जुटे हुए है और अपना-अपना सिक्का जमाने में लगे हुए है। लेकिन इसमें सबसे दिलचस्प और शर्मनाक किस्सा गुजरात राज्य का है। बताया जाता है कि गुजरात भाजपा अहमदाबाद सिरियल ब्लास्ट में मारे गए 55 लोगों के परिजनों को फूटी कोडी सहाय नहीं दे सकी और अब बिहार के बाढ प्रभावितों की मदद के लिए बढ-चढ कर उत्साह से काम पर लग गई है। लेकिन इनका तरीका बडा ही शर्मसार करने वाला है।
सिरियल ब्लास्ट में जो 55 लोग मारे गए उन्हें राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक परिवार को पांच-पांच लाख सहाय देने की घोषणा हुई थी। विपक्ष कांग्रेस ने प्रत्येक मृतकों के परिवार को एक-एक लाख दिए हैं। कांग्रेस ने मृतकों के परिवार के लिए घोषणा की तब भाजपा नेताओं को पूछा गया कि, भाजपा इन मृतकों के परिवार को कांग्रेस की तरह कोई सहाय देना चाहती है या नहीं? ऐसा पूछने पर उनका जवाब था कि, "हमारी सरकार ने रुपये दिए तो है। हम दें या हमारी सरकार दें बात तो एक ही है।" भाजपा के यह नेता भूल गए कि सरकार के रुपये भाजपा के नहीं है लेकिन जनता के पसीने की कमाई है। अहमदाबाद सिरियल ब्लास्ट के मृतकों के परिवार को एक रुपये की भी सहायता नहीं देने वाली भाजपा ने बिहार के बाढ प्रभावितों के लिए लोगों के पास जाकर पुराने कपडे नहीं लेकिन... नई साडियां, धोतियां, कंबल, गद्दीयां, बरतन इकठ्ठा करने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को सूचना दी है। बताया जाता है कि भाजपा लोगों से यह राहत सामग्री इकठ्ठा कर कीट बना उस पर अपना सिक्का लगाकर बिहार भेजेगी तब सहाय लेने वाली बिहार की जनता भाजपा के गुणगान गायेगी या गुजरात की जनता की? अनाम बनकर वहां बिना किसी प्रचार और दुंदभि के मदद करनी चाहिए कि लोग भूल जायें कि वहां बाढ आई थी। राहत पर राजनीति बाद में कर लीजिएगा। पहले इन चुनौतियों से तो निपटो। बहरहाल, सरकार क्या कर रही है, यह सवाल बेमानी है। हम क्या कर रहे हैं, यह सवाल मौजू है। लिहाजा, मानकर चलें कि बाढ हमारे अपने किसी के घर से होकर गुजरी है।
जय हिंद

बुधवार, 3 सितंबर 2008

BMW केस : भारत के न्यायतंत्र में देर सही पर अंधेर नहीं

बात है दिल्ली के BMW केस यानि, भारतीय नौकादल के भूतपूर्व प्रमुख ए एस एम नंदा के नाती संजीव नंदा की। संजीव नंदा 10 जनवरी 1999 को गुडगांव से अपने दोस्त मानेक कपूर के साथ पार्टी में से अपनी बहन की BMW कार में वापिस आ रहा था तब लोधी चेक पॉइन्ट पर पुलिस ने उसे कार रोकने को कहा लेकिन नशे में धूत संजीव नंदा ने कार को रोकने के बजाय पुलिस अधिकारियों पर कार चढा दी।
इस वारदात में चार कॉन्स्टेबल घटनास्थल पर ही मारे गए थे जबकि, दो ने अस्पताल में दम तोड दिया था। मनोज नामक एक युवक गंभीर रूप से घायल हुआ था। संजीव दुर्घटना के बाद कार रोककर नीचे उतरा था लेकिन मानेक के कहने पर वापिस कार में बैठ गया था और कार भगाकर उसके दोस्त सिध्धार्थ गुप्ता के घर पहुंचा था जहां कार की साफ-सफाई कर दी गई थी।
जबकि, घटनास्थल पर मिले कार के नंबर प्लेट के आधार पर संजीव ने दुर्घटना किए होने का रहस्य खुला था। सुनील कुलकर्णी नामक मुंबई के एक व्यापारी ने इस वारदात को अपनी आंखों से देखा था। बयान में उसने कहा था कि, उसने संजीव नंदा को कार चढाते हुए देखा है। जबकि, मनोज नामक युवक जो इस हादसे में बच गया था उसने अपने बयान में कहा कि, वह शायद ट्रक से घायल हुआ है। बयान देने के पश्चात मनोज रहस्यमय रूप से गायब हो गया था।
संजीव नंदा की इस केस में गिरफ्तारी हुई थी लेकिन बाद में इस रईसजादे को 15 करोड के जमानत पर छोड दिया गया था। इसके बाद संजीव नंदा भारत छोडकर फरार हो गया था। जबकि, GNFC बराक मिसाइल सौदे के केस में वह मार्च 2008 से जेल में है। 2007 में इस केस में दिल्ली की एक कोर्ट ने संजीव सहित तमाम सहयोगियों को सुबूत के अभाव में निर्दोष बरी कर दिया था।
अब बात करते है कि यह केस इतने सालों बाद किन कारणों से चर्चा में आया है। तो इसकी वजह है संजीव नंदा और उसके सहयोगी जो निर्दोष बरी हो गये थे वे किस तरह बरी हुए.... इसके पीछे क्या माजरा था। संजीव नंदा बडे बाप की बिगडी हुई औलाद है। और जैसे फिल्मों में हमें देखने को मिलता है उसी तरह इस बिगडी हुई औलाद को बचाने के लिए उसके बाप ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।
आर.के.आनंद की गिनती देश के जाने-माने वकीलों में होती है और संजीव के बाप ने अपने रईसजादे को बचाने के लिए आनंद को केस सौंपा था। आनंद ने बाकी सारे प्यादों को ठीक से जमा लिया था लेकिन एक रास्ते का रौडा था सुनिल कुलकर्णी। संजीव ने अपनी कार के नीचे जिन सात लोगों को कुचला था उसे सुनिल ने अपनी आंखों से देखा था और दूसरे गवाह बयान से मुकर गये थे तब भी सुनिल अपने बयान पर अडिग था। सवाल था कि अब सुनिल का क्या किया जाए। इस केस में पब्लिक प्रोसिक्यूटर के तौर पर आई.यु.खान नामक वकील थे और खान की आनंद के साथ पुरानी और अच्छी दोस्ती थी। इस केस में भी खान ने आनंद को तन, मन, धन से मदद की थी। आखिरकार, सुनिल को मनाने के लिए खान को मैदान में उतारना पडा। खान ने सुनिल को पैसों का ऑफर दिया। सुनिल ने ढाई करोड मांगे और फिर थोडी माथापच्ची हुई। जबकि,खान और आनंद को पता नहीं था कि, सुनिल उन्हें मामू बना रहा है और एक टीवी चैनल उनकी फिल्म उतार रही है। इस पूरे सौदेबाजी की फिल्म उतारी गई और बाद में चैनल ने आनंद और खान का भंडा फोड दिया। और पूरा स्टिंग ऑपरेशन दुनिया को दिखा दिया। एक अपराधी के वकील से मिलकर एक सरकारी वकील कैसे-कैसे कारनामों को अंजाम देता है उसे देख लोगों के दांतों तले ऊंगलियां दब गई थी।
इस मामले की तह तक पहुंचने में माननीय अदालत को नौ वर्ष का लंबा समय जरूर लगा, किंतु जो नतीजा निकला है, वह न्यायपालिका की नीर-क्षीर विवेकी क्षमता की पृष्टि करता है। पटियाला हाउस अदालत ने संजीव नंदा को गैर इरादतन हत्या का दोषी करार दिया है। यदि यह महज एक सडक दुर्घटना होती और दुर्घटना के लिए जिम्मेदार किसी ड्राइवर के खिलाफ केस चल रहा होता, तो शायद इसकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता। लेकिन यह एक ऐसी कहानी थी, जिसमें कुछ अमीर लोगों द्वारा बडी ह्रदयहीनता के साथ आम लोगों को कुचलने के बाद सुबूत नष्ट करने से लेकर छिपने-छिपाने और अदालत में मामले को अपने पक्ष में मोडने तक की भौंडी कोशिशें की गई थी। अमीरी के नशे में लोग सोचते हैं कि धन के जरिये वे कुछ भी खरीद सकते है। चूंकि अपने देश में ऐसा होता रहा है।
21 अगस्त 2008 को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर आनंद और खान दोनों की प्रैक्टिस पर चार महिने की पाबंदी लगा दी। देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों का कहना है कि, आनंद और खान ने जो गुल खिलाये और न्यायतंत्र को खरीदने की जो गुस्ताखी की है उसके सामने यह सजा बेहद सस्ती और मामूली है यानि कि, यह दोनों बहुत सस्ते दाम पर छूट गए।
हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है वह दो रूप से काबिलेतारीफ है। एक तो हाईकोर्ट ने मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन पर भरोसा किया और दूसरा यह कि, इससे इस देश की जनता में एक नेक संदेश जाता है कि, वकील चाहे बिकाऊ हो.... रईसों के तलवे चाटते हो.... उनके दलाल बनकर न्यायतंत्र को मजाक समझते हो लेकिन कानून बिकाऊ नहीं है...... पैसों के जोर का इस पर कोई असर नहीं हो सकता..... कानून अपना फर्ज नहीं भूला है।
और आज इस केस के अपराधियों को सजा सुनाई जानेवाली है तब देखना यह है कि, जहां पैसा बोलता है..... वहां इन्साफ क्या बोलता है।
यह सुखद संयोग ही है कि पिछले एक वर्ष के दौरान हमारी अदालतों ने लगभग सभी हाई-प्रोफाइल मुकदमों में दूध का दूध और पानी का पानी किया। BMW मामले में नंदा को दस वर्ष तक की जेल हो सकती है, लेकिन सवाल सजा की अवधि का नहीं, दोष पर मुहर लगने का था, ताकि समाज इससे सबक ले सके।
जय हिंद