मायावती वर्सिस सोनिया और रायबरेली की रणभूमि
केन्द्रीय रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव ने 2008-09 के रेल बजट में सोनिया गांधी के संसदीय मतक्षेत्र रायबरेली में रेलवे के डिब्बे बनाने के प्रोजेक्ट की घोषणा की थी। इस प्रोजेक्ट को सोनिया गांधी का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ माना जाता है क्योंकि इस प्रोजेक्ट के तहत रायबरेली में 10 हजार लोगों को नौकरी मिलने वाली है। इस प्रोजेक्ट में रेल मंत्रालय रु. 1000 करोड का निवेश करेगा और 2010 में उत्पादन शुरु होगा। प्रथम वर्ष 1200 डिब्बे और उसके बाद हर साल 1500 डिब्बों का निर्माण इस प्लान्ट में होगा। इस प्रोजेक्ट के लिए मायावती सरकार ने ही 400 एकड जमीन का आवंटन भी रेल मंत्रालय को कर दिया था और ग्रामसभा ने इस जमीन का कब्जा भी रेल मंत्रालय को सौंप दिया था। 14 अक्तूबर को इस प्लान्ट का शिलान्यास होनेवाला था और उसके चार दिन पहले यानि कि 10 अक्तूबर को रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट संतोष कुमार श्रीवास्तव ने घोषणा की कि राज्य सरकार ने यह जमीन रेल मंत्रालय को सौंप दी थी लेकिन इस जमीन पर कोई प्रोजेक्ट शुरु न होने के कारण किसानों में असंतोष था और वे अपनी जमीन वापस चाहते है इसलिए राज्य सरकार ने इस जमीन आवंटन को रद्द करने का निर्णय लिया है। 11 अक्तूबर को मायावती ने रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट के रिपोर्ट के आधार पर रेल मंत्रालय को जमीन आवंटन रद्द करने की घोषणा की और उसके कारण सोनिया एवं लालू जिसमें उपस्थित रहने वाले थे उस शिलान्यास को स्थगित रखना पडा। रेल मंत्रालय ने मायावती सरकार के निर्णय को सुप्रीमकोर्ट में ललकारा है और सुप्रीमकोर्ट ने जमीन आवंटन रद्द करने के निर्णय के सामने स्टे दिया है। अब 17 अक्तूबर को सुनवाई होगी। रेल मंत्रालय ने राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय आए तो रायबरेली में ही रेलवे की जमीन पर इस फैक्ट्री को शुरु करने की घोषणा कर दी है इसे देखते हुए इसमें दो राय नहीं कि यह प्रोजेक्ट रायबरेली में ही शुरु होगा।
हम जब दुनिया के दूसरे देशों की ओर देखें और उन देशों के विकास की ओर नजर डालें तब अफसोस होगा कि जिनके पास कोई स्त्रोत नहीं है, कोई ताकत नहीं है, मेनपावर नहीं है ऐसे देश आज समृद्ध है। हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम कंगाल जैसी स्थिति में जीने को मजबूर है। यह सवाल बार-बार जेहन में उठता है और इसका सिर्फ एक ही जवाब है हमारी सियासत और राजनेता। हमारा देश पिछडेपन और कंगाल अवस्था में जीने को क्यों मजबूर है? हम सबसे पिछडे क्यों है? क्योंकि हमारे देश में शासनकर्ताओं की एक ऐसी जमात मौजूद है और उनके रहते हमारा देश कभी विकास की बुलंदी को नहीं छु सकता। इन नेताओं ने अपने निजी स्वार्थ के कारण इस देश के विकास में अडचन डाल दी है।
रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री को दी गई जमीन का आवंटन रद्द होना तथा कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को सार्वजनिक रैली को संबोधित करने से रोकने के लिए धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश इन दोनों के कारण उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी सरकार की अक्ल पर तरस आती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उस 400 एकड जमीन के मामले पर यथास्थिति बनाये रखने के आदेश दिए हैं जिसका आवंटन मायावती सरकार ने इस तर्क के साथ रद्द कर दिया कि वहां के किसान रेल कोच के लिए जमीन देने को तैयार नहीं है। चूंकि भारत सरकार एवं अन्य तथा रायबरेली के किसानों की ओर दाखिल याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने यथास्थिति कायम रखने का अंतरिम आदेश दे दिया अत: बाजी हाथ से जाने की आशंका के चलते मायावती सरकार ने धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिये। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को शिकस्त देने में चालाकी, चालबाजी और चतुराई की अपनी भूमिका होती है। यहां समझ में आ रहा है कि ऐसे क्षुद्र टोटकों को आजमाकर मायावती अपनी ही फजीहत लेंगी।
राजनीति में मायावती का अपना धाकड अंदाज है। इसी के चलते वह कई बार तानाशाह जैसी भूमिका में दिखाई देती है। दूसरी बात सत्ता की गर्मी उनके सिर पर कितनी ही बार इस हद तक चढी देखी गई कि राजनीति में न्यूनतम संकोच और मर्यादा का पालन तक होते नहीं दिखा।
राजनीतिक जीवन और पद दोनों के मामले में किसी को अमर नहीं कहा जा सकता। वास्तव में कोच फैक्ट्री के भूमि आवंटन को रद्द किये जाने से भारतीय राजनीति में नये संक्रमण के संकेत मिलते हैं। प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल को श्रेय से वंचित करने के लिए अडंगा डालने की राजनीति की जो शुरुआत पश्चिम बंगाल में सिंगूर में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने की उसे रायबरेली में मायावती ने आगे बढाया है। साणन्द (गुजरात) में कांग्रेस के प्रवक्ता अर्जुन मोढवाडिया भी इस रास्ते पर चलने की सोच रहे हैं। कुल मिलाकर महसूस होने लगा है कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है। जहां तक मायावती की बात है, तो वह सत्ता की दादागिरी के चक्कर में कांग्रेस को ही पैर जमाने का मौका दे बैठी है।
कुछ समय पूर्व बंगाल में ममता बनर्जी ने ऐसी ही भावना का प्रदर्शन कर रतन टाटा को बंगाल से भगाया था और अब मेडम माया की बारी है। ममता की लडाई गलत नहीं थी लेकिन उनका स्वार्थ गलत था। मायावती ने अभी जिस तरह रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री के प्रोजेक्ट में अडचन पैदा की है यह उनकी तुच्छ मानसिकता को प्रदर्शित करता है। ममता के किस्से में तो यह विरोध पार्टी में है और उन्हें राजनीतिक तौर पर फिर से खडे होने के लिए एक नौटंकी की जरुरत थी इसलिए उन्होंने यह खेल खेला लेकिन मायावती के किस्से में तो यह मजबूरी भी नहीं है। मायावती उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री है और उनके राज्य में एक बडा प्रोजेक्ट आए, इससे 10 हजार लोगों को नौकरी मिलेगी, तब तो उन्हें इस प्रोजेक्ट के कारण खुश होना चाहिए और इस प्रोजेक्ट का स्वागत करना चाहिए लेकिन मेडम इस प्रोजेक्ट का सत्यानाश करने पर तुली है।
आज जब बडी कंपनियां अपने राज्य में प्रोजेक्ट लेकर आए तो इसके लिए मुख्यमंत्री उद्योगपतियों से अपील करते है लेकिन माया मेडम राजनीतिक हिसाब करने में लगी है यह देखकर दु:ख होता है। जिस देश में ऐसे राजनेता हो वह देश कभी अमरिका या जापान या जर्मनी को छोडो लेकिन चीन या कोरिया की बरोबरी भी नहीं कर सकता। राज्य का जो होना है हो और लोगों को नौकरी मिले या ना मिले लेकिन उनका स्वार्थ पूरा होना चाहिए। अगर हमारा शासनकर्ता ऐसा मानता है तो ऐसा नेता देश का विकास करवा सकेंगे?
रायबरेली के प्रोजेक्ट के मामले सबसे आघातजनक बात तो यह है कि उन्होंने जिस जमीन के आवंटन को रद्द किया यह जमीन उन्होंने ही रेल मंत्रालय को दिया था। उस वक्त मायावती और कांग्रेस के बीच हनीमुन चल रहा था इसलिए मायावती कांग्रेस पर फिदा थी और मेडम सोनिया की हर बात में हां में हां मिलाने को अपना सौभाग्य समझती थी। रायबरेली सोनिया गांधी का मतक्षेत्र है इसलिए उन्होंने झुमते हुए यह जमीन आवंटित किया था। उसके बाद अब तक जैसा होता रहा है वैसा कांग्रेस के साथ भी मायावती का अनबन हुआ इसलिए वे कांग्रेस को दबोचने का मौका ढूंढती रहती है। कांग्रेस ने मुलायम के साथ हाथ मिलाया इसलिए माया मेडम ज्यादा क्रोधित हो गई है और कांग्रेस का पत्ता साफ करने का एक भी मौका गवाना नहीं चाहती। कांग्रेस और मायावती कुश्ती करे या हनीमुन मनाए इससे लोगों को कोई लेना-देना नहीं है लेकिन इसके कारण विकास पर जो असर हो रहा है यह बिल्कुल नहीं चलेगा।
मायावती को इन सब से कोई लेना-देना नहीं है। मायावती भारतीय राजनीति में एक अजीब केरेक्टर है और उनमें दिमाग या तमीज नाम की कोई चीज नहीं है। इनका जिनके साथ अनबन हो जाए उनका सत्यानाश करने में वे किसी भी हद तक जा सकती है। अमरसिंह से लेकर अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी से लेकर आडवानी तक सभी को इन्होंने अपना कातिल अंदाज दिखा दिया है। मेडम जिनके सामने विरोध जताती है उनकी गरज पडे उन्हें गले लगाने में भी इन्हें कोई झिझक महसूस नहीं होती। एक जमाने में मायावती और भाजपा साथ-साथ थे तब मायावती लालजी टंडन को अपना भाई कहती और आडवानी को पिता समान गिनती थी। भाजपा के साथ अनबन होने बाद मेडम भाजपा के नेताओं के कान से कीडे रैंगे ऐसी गालियां देती है। मायावती के लिए यह बहुत ही मामूली बात है। कल को अगर जरुरत पडे तो यह आडवानी को बाप बनाकर पांव पड सकती है और राजनाथ को भाई बनाकर राखी भी बांध सकती है। हमें इससे कोई ऐतराज नहीं है। आडवानी या राजनाथ को ऐतराज ना हो तो हम भला कौन होते है? यूं तो रायबरेली में रेल प्रोजेक्ट स्थापित नहीं हो तो भी हमें कोई ऐतराज नहीं और उसका हमें कोई फर्क नहीं पडता लेकिन हम कहां माया या ममता जैसी मानसिकता वाले है। हम तो पूरे देश को एक मानकर सोचते है इसलिए दु:खी होना पडता है।
माया-ममता या अन्य इनके जैसे लोग एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते है। ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों से इनका स्वार्थ पूरा होता होगा और दो-चार दिन का नशा चढता होगा लेकिन इससे समाज को और आम आदमी को कोई लाभ नहीं मिलता है। अगर किसी शासक को ज्यादा लंबे समय तक टिकना है तो इन सब मुद्दों को एक ओर रख लोगों के लिए सोचने की आदत डालनी चाहिए, विकास को महत्व देना चाहिए। लोग विकास को याद रखेंगे। आपके स्वार्थभरे विजय को नहीं। धन्य है हमारे देश के यह नेता! ऐसे नेता हो तो हमारा देश आगे कैसे आयेगा?
जय हिंद
पूज्य माँ
13 वर्ष पहले


